पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)
Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary
पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३८८ ) पञ्चतन्त्रम् ।
भवानीके निमित्तही नित्य भक्ष्य विशेषोंको लेजाती है”। तब देवीके स्थानमें जाय स्नानके निमित्त नदीमें उतर कर जबतक स्नानक्रिया करती है तबतक उसका स्वामी और मार्गसे आकर देवीके पीछे अदृश्य होकर बैठगया। तब वह ब्राह्मणी स्नानकर देवीके मन्दिरमें आय स्नान अनुलेपन माला धूप बलि क्रियादिक कर देवीको प्रणाम कर कहती हुई—“भगवति ! किस प्रकारसे मेरा स्वामी अन्धा हो जायगा ?” यह सुनकर स्वर बदलकर देवीके पीछे बैठे हुए ब्राह्मणने कहा जो तू निरन्तर घृतसे पूर्ण पदार्थ अपने स्वामीको देगी, तो शीघ्र अंधा हो जायगा”। वह व्यभिचारिणी बनावटी वचनोंसे वंचितमनवाली उस ब्राह्मणको वही पदार्थ नित्य देती हुई। तब एक दिन ब्राह्मणने कहा—“भद्रे ! मुझे अच्छी तरह नहीं दीखता”। यह सुन इसने विचार किया कि “देवीकी प्रसन्नता हुई”। तब उसका हृदयवल्लभ जार उसके निकट यह ब्राह्मण तो अंध है मेरा क्या करेगा ऐसा जान निःशंकहो प्रतिदिन आता तब एक दिन प्रवेश करते उस समीप आयेको देख उसके बाल पकड डंडेसे पार्ष्णि ( पसली ) आदिमें प्रहारकर उसको ताडन करता हुआ। जब यह मरगया तब उस दुष्ट स्त्रीकी नाक काटकर त्यागन करता हुआ। इससे मैं कहता हूं-
सर्वमेतद्विजानामि यथा वाह्योऽस्मि दर्दुरैः ।
किञ्चित्कालं प्रतीक्ष्योऽहं घृतान्धो ब्राह्मणो यथा॥२५०॥”
कि मै यह सब जानता हूं जिस कारण मुझपै मेडक चढे हैं कुछ समयकी प्रतीक्षा करता हूं जैसे घृत पदार्थसे (कृत्रिम) अंधे ब्राह्मणने प्रतीक्षा की॥२५०॥”
अथ मन्दविषोऽन्तर्लीनमवहस्य पुनरपि “मण्डूका विविधास्वादाः” इति तमेवमब्रवीत् । अथ जलपादः तच्छ्रुत्वा सुतरां व्यग्रहृदयः “किमनेन अभिहितम्” इति तमपृच्छत्—“भद्र ! किं त्वया अभिहितमिदं विरुद्धं वचः” । अथासौ आकारप्रच्छादनार्थं “न किञ्चित्” इति अब्रवीत् । तथैव कृतकवचनव्यामोहितचित्तो जलपादस्तस्य दुष्टाभिसन्धिं न अवबुध्यते । किं बहुना, तथा तेन सर्वेऽपि भक्षिता यथा बीजमात्रमपि न अवशिष्टम् । अतोऽहं ब्रवीमि-