पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)
Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary
पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम् । ( ३८९ )
तब मन्दविष सर्पने मनमें हँसकर "मेडकोंमें अनेक प्रकारका स्वाद है" ऐसा उससे कहा। तब जलपाद अत्यन्त दुःखी हृदय होकर "इसने क्या कहा" ऐसा उससे पूछता हुआ- "भद्र ! क्या तुमने यह विरुद्ध वचन कहा" तब यह आकारछिपानेके निमित्त "कुछ भी नहीं" ऐसे बोला । इसीप्रकार बनावटी वचनोंसे मोहितचित्त जलपाद उसके दुष्टाभिप्रायको न जानता हुआ । बहुत कहनेसे क्या उसने इसप्रकार वे सब भक्षण किये जो बीजमात्रभी न बचा इससे मैं कहता हूँ-
"स्कन्धेनापि वहेच्छत्रुं कालमासाद्य बुद्धिमान् । महता कृष्णसर्पेण मण्डूका बहवो हताः ॥ २५१ ॥"
"समयको प्राप्त हो बुद्धिमान् शत्रुओंको कन्धेपर चढावे जैसे बडे काले सापने (शिरपर चढाय ) बहुतसे मेडक मारे ॥ २५१ ॥"
अथ राजन् ! यथा मन्दविषेण बुद्धिबलेन मण्डूका निहताः तथा मयापि सर्वेऽपि वैरिण इति । साधु चेदमुच्यते-
भो राजन् जैसे मन्दविषने बुद्धिके बलसे मेडक मारे इसीप्रकार मैंने भी सब वैरी ( मारे ) । यह अच्छा कहा है कि-
"वने प्रज्वलितो वह्निर्दहन्मूलानि रक्षति । समूलोन्मूलनं कुर्याद्वायुर्यो मृदुशीतलः ॥ २५२ ॥"
'वनमें प्रज्वलित अग्नि जलाती हुईभी मूलोंकी रक्षा करतीहै परन्तु जो मृदु और शीतल वायुहै वह जडसेही ( वृक्षादि ) का उन्मूलन करदेतीहै ॥ २५२ ॥"
मेघवर्ण आह-"तात ! सत्यमेवैतत् । ये महात्मानो भवन्ति ते महासत्त्वा आपद्गता अपि प्रारब्धं न त्यजन्ति । उक्तञ्च यतः-
मेघवर्ण बोला,-"तात ! यह सत्यहै जो महात्मा होतेहैं वे महाबली आपत्तिको प्राप्त होकरभी प्रारब्धको नहीं छोडतेहै । कहा है कि-
महत्त्वमेतन्महतां नयालङ्कारधारिणाम् । न मुञ्चन्ति यदारब्धं कृच्छ्रेऽपि व्यसनोदये ॥ २५३ ॥
नीतिका भूषण धारणकरनेवाले महात्माओंका यही महत्त्वहै जो अतिकष्टकी विपतमें भी आरम्भको नहीं त्यागते हैं ॥ २५३ ॥