पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)
Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary
पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम् । ( ३९१ )
शस्त्रसे मारेहुए भी शत्रु नहीं मरते बुद्धिसे मारे हुए शत्रु अच्छीतरह मरते हे, शस्त्र पुरुषके एकही शरीरको मारताहै, बुद्धि कुल, ऐश्वर्य और यशका नाश करती है ॥ २९६ ॥
तदेवं प्रज्ञापुरुषकाराभ्यां युक्तस्य अयत्नेन कार्य्यसिद्धयः सम्भवन्ति ।
सो बुद्धि और पराक्रमसे युक्त पुरुषकी बिनाही यत्नके कार्य्यसिद्धि होतीहै—
प्रसरति मतिः कार्य्यारम्भे दृढीभवति स्मृतिः स्वयमुपनयन्नर्थान्मन्त्रो न गच्छति विप्लवम् । स्फुरति सफलस्तर्कश्चित्तं समुन्नतिमश्नुते भवति च रतिः श्लाघ्ये कृत्ये नरस्य भविष्यतः ॥२९७॥
शुभ होनेवाले मनुष्यके कार्य प्रारम्भ करनेको बुद्धि दृढ होती है और स्वयं कृत्य वस्तुओंको प्रगट करता हुआ मन्त्र विपरीतताको प्राप्त नहीं होता, विचार सफल होता स्फुरायमान होता है, चित्त उत्साहको प्राप्त होता है और प्रशंसनीय कार्यमें अनुराग होता है ॥ २९७ ॥
तथाच—
और देखो—
नयत्यागशौर्य्यसम्पन्ने पुरुषे राज्यमिति । उक्तञ्च—
नय, त्याग और शूरता सम्पन्न पुरुषमेही राज्य होता है । कहा है—
त्यागिनि शूरे विदुषि च संसर्गरुचिर्जनो गुणी भवति । गुणवति धनं धनाच्छ्रीः श्रीमत्याज्ञा ततो राज्यम् ॥२९८॥
त्याग युक्त शूर और पंडितजनकी संगतिमें रुचि करनेवाला पुरुष गुणी होता है । गुणवालेमें धन, धनसे लक्ष्मी, लक्ष्मीवालेमें आज्ञा, आज्ञावाले जनमे राज्य स्थित रहता हे ( आर्या वृत्त ) ॥ २९८ ॥”
मेघवर्ण आह,—“नूनं सद्यःफलानि नीतिशास्त्राणि यत् त्वया अनुकृत्येन अनुप्रविश्य अरिमर्दनः सपरिजनो निःशेषितः” । स्थिरजीवी आह,—
मेघवर्ण बोला,—“शत्रुको अवश्यही नीतिशास्त्र शीघ्रफलवाले हैं, जिनके मतवर्ती तुमने उनके अन्तरमे प्रवेश कर परिवारसहित अरिमर्दनको निश्शेष करदिया”
स्थिरजीवी बोला—