भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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भाषाटीकासमेतम् । ( ३९५ )

यदैव राज्ये क्रियतेऽभिषेकस्तदैव बुद्धिर्व्यसनेषु योज्या ।
घटा हि राज्ञामभिषेककाले सहाम्भसेवापद्मुद्धिरन्ति ॥२६६॥

जिस समय राज्यमें अभिषेक किया उसी समयसे राजाने विपत्तिके विषयमें बुद्धीको लगा देना चाहिये, राजोंके अभिषेकसमयमें घट जलोके साथही आपत्तिको निकालते हैं ॥ २६६ ॥

न च कश्चित् अनधिगमनीयो नाम अस्ति आपदामुक्तञ्च-
आपत्तियोंको कोईभी अगम्य नहीं है, कहा है कि-

रामस्य व्रजनं बलेर्नियमनं पाण्डोः सुतानां वनं
वृष्णीनां निधनं नलस्य नृपते राज्यात्परिभ्रंशनम् ।
नाट्याचार्य्यकमर्जुनस्य पतनं सञ्चिन्त्य लङ्केश्वरे
सर्वं कालवशाज्जनोऽत्र सहते कः कं परित्रायते ॥२६७॥

रामचन्द्रको वनगमन, बलिको वधन, पाण्डुपुत्रोंको वनवास, यदुवंशियोंका निधन, राजा नलका राज्यसे भ्रष्ट होना, अर्जुनका (विराट भवनमें) नाट्याचार्य होना, (त्रिभुवन विजयी) रावणका नाश विचार कर यह जन कालवशसे सब कुछ सहते हैं, कौन किसकी रक्षा करता है (अर्थात् कोई नहीं शार्दूलविक्रीडितवृत्त) ॥ २६७ ॥

क्व स दशरथः स्वर्गे भूत्वा महेन्द्रसुहृद्गतः
क्व स जलनिधेर्वेलां बध्वा नृपः सगरस्तथा ।
क्व स करतलाज्जातो वैन्यः क्व सूर्य्यतनुर्मनु-
र्ननु बलवता कालेनैते प्रबोध्य निमीलिताः ॥ २६८ ॥

जो इन्द्रके सुहृद् होकर स्वर्गमे गये वह दशरथ कहा हैं, समुद्रकी वेलाके नियन्ता राजा सगर कहा हैं, वेनराजाके हाथके मथनसे उत्पन्न हुवा (देखो श्रीमद्भागवत पर हमारा तिलक) पृथुराजा कहा है, सूर्यका पुत्र मनु कहा है, भो ! कालने यह सब बली प्रगट कर नष्ट करादिये ॥ २६८ ॥

मान्धाता क्व गतस्त्रिलोकविजयी राजा क्व सत्यव्रतो
देवानां नृपतिर्गतः क्व नहुषः सच्छास्त्रवान् केशवः ।
मन्यन्ते सरथाः सकुञ्जरवराः शक्रासनाध्यासिनः
कालेनैव महात्मना त्वनुकृताः कालेन निर्वासिताः २६९