पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)
Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary
पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३९६ ) पञ्चतन्त्रम् ।
त्रिलोकका जीतनेवाला मान्धाता कहां गया ?, सत्यव्रत राजा कहां है ?, देवताओंका राजा नहुष कहां गया ?, सत् शास्त्रवान् भगवान् केशव कहां है ?, यह महात्मा जो इन्द्रके सहित एक आसनमें बैठनेवाले माने जाते थे, कालने इनको उत्पन्न किया और विध्वंस भी कर दिया ॥ २६९ ॥
अपि च-
औरभी-
स च नृपतिस्ते सचिवास्ताः प्रमदास्तानि काननवनानि ।
स च ते च ताश्च तानि च कृन्तान्तदृष्टानि नष्टानि ॥२७०॥
वह राजा, वह मंत्री, वे स्त्री, वे उपवन, वे ( राजा ) वह ( मंत्री ) वे सब कालने देखकर खाय नष्ट कर दिये ॥ २७० ॥
एवं मत्तकरिकर्णचञ्चलां राज्यलक्ष्मीमवाप्य न्यायैकनिष्ठो भूत्वा उपभुङ्क्ष्व-
इति श्रीविष्णुशर्मविरचिते पञ्चतन्त्रके काकोलूकीयं नाम
तृतीयं तन्त्रं समाप्तम् ।
इस प्रकार मतवाले हाथीके कानकी समान चञ्चल राज्य लक्ष्मीको प्राप्त हो न्यायकी निष्ठावान होकर भोगकरो ।
इति श्रीविष्णुशर्मविरचिते पञ्चतंत्रके पंडितज्वालाप्रसादमिश्रकृतभाषाटीकायां काकोलूकीयं नामतृतीयं तन्त्रं सम्पूर्णम् ।