पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)
Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary
पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम् । ( ३९९ )
दाता, ततो व्यापादयितुं न शक्यते । तत् त्यज एनं मिथ्याग्रहम् । उक्तञ्च-
ऐसा कह उसके निमित्त जम्बूफल दिये । वह भी उनको भक्षणकर उसके साथ चिरकाल गोष्ठीसुखका अनुभवकर फिर अपने घरको गया । इस प्रकार नित्यही वह वानर और नाका जामनकी छायामें स्थित हुए विविध शास्त्रकी गोष्ठीसे समय बिताते सुखसे स्थित रहे । वह मकरभी खानेसे बचे हुए जामनके फलोंको घर जाकर अपनी स्त्रीको देता । तब एक दिन उसने उससे पूछा- “नाथ ! कहासे यह अमृतमय फल लातेहो ?” वह बोला- “भद्रे ! मेरा एक परम मित्र रक्तमुख वानर प्रीतिसे इन फलोंको देताहै । तब उसने कहा जो सदा ऐसे अमृतमय फल खाताहै उसका हृदयभी अमृतकी समान होगा । सो यदि मुझ भार्यासे तेरा कुछ प्रयोजन हो तो उसका हृदय लाकर मुझेदे । जिससे उसे भक्षणकर जरा मरणसे रहित हो तेरे साथ भोग भोगू' ।" वह बोला- “भद्रे ! ऐसा मत कहो कारण कि वह बुद्धिमान् हमारा भ्राता तथा फल देनेवालाहै वह मारा नहीं जासक्ता सो इस मिथ्या आग्रहको त्यागदो कहा है कि-
एकं प्रसूयते माता द्वितीयं वाक् प्रसूयते ।
वाग्जातमाधिकं प्रोचुः सोदर्य्यादपि बन्धुवत् ॥ ६ ॥”
माता एक सोदर उत्पन्न करती है, वाणी दूसरा उत्पन्न करती है, वाणीसे उत्पन्न हुआ सोदरसे भी अधिक मित्रकी समान श्रेष्ठ होता है ऐसा पंडितोंने कहा है ॥ ६ ॥”
अथ मकरी आह - “त्वया कदाचित् अपि मम वचनं अन्यथा कृतम् । तत् नूनं सा वानरी भविष्यति यतः तस्या अनुरागतः सकलमपि दिनं तत्र गमयसि । तत् त्वं ज्ञातो मया सम्यक् । यतः-
तब मकरी बोली- “तैने कभी मेरा बचन अन्यथा न किया, सो अवश्यही वह वानरी होगी । इससे उसके अनुरागसे सम्पूर्ण दिन वहा बिताते हो सो यह मैंने अच्छी प्रकार जान लिया जिससे-
साह्लादं वचनं प्रयच्छसि न मे नो वाञ्छितं किञ्चन
प्रायः प्रोच्छ्वसिषि द्रुतं हुतवहज्वालासमं रात्रिषु ।