भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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( ४०४ ) पञ्चतन्त्रम् ।

परन्तु हम वनचर हैं और तुम्हारा जलके अन्तमें घर है सो मैं किस प्रकार वहां जासक्ता हूं । इस कारण उस हमारी भाभीको यहीं लाओ जिससे प्रणाम कर उसका आशीर्वाद ग्रहण करूं” । वह बोला,—“भो मित्र ! समुद्रके भीतर तटमें मनोहर बालुकामय स्थानमें हमारा घर है । सो मेरी पीठपर चढ सुखसे निर्भय हो चलो” । वहभी यह सुन आनन्दसे बोला,—“भद्र ! यदि ऐसा है तो देर करनेका क्या काम शीघ्रता करो यह मैं तुम्हारी पीठपर चढा ” । ऐसा कहकर जलमें जाते हुए मकरको देख कर भयसे व्याकुल मन हो वानर बोला— “भाई शनैः २ चलो । जलकी लहरोंसे मेरा शरीर ढका जाता है” । यह सुन- कर मकर विचारने लगा । “यह अगाध जलमें प्राप्तहो मेरे वशीभूत हुआ है, मेरी पीठको प्राप्त हुआ तिलमात्रभी नहीं चल सकता है । सो इससे अपना अभिप्राय कहूं जिससे यह अपने इष्ट देवताका स्मरण करे” । और बोला भी— “मित्र ! तुमको मैं भार्याके वाक्यसे विश्वास दिलाकर मारनेके निमित्त लाया हूं ! सो अपने इष्ट देवताका स्मरण करो” । वह बोला,—“भ्राता ! क्या मैंने उसका और तुम्हारा अपकार किया है? जो मेरे वधका उपाय विचार किया है”। मकर बोला,—“भो ! उसको अमृतमय फलके रसास्वादसे मीठे तुम्हारे हृदय खानेका गर्भावस्थाका मनोरथ है तिससे यह अनुष्ठान किया है” । तत्कालबुद्धि प्रगटवाला वानर बोला,—“भद्र ! जो ऐसा है तो वहीं तुमने क्यों न मुझसे कहा । जो कि मैने अपना हृदय जम्बूकी कोटरमें सदाहीसे गुप्त कर रक्खा है । सो तुम्हारी पत्नीकोही अर्पण करूं । सो तुम मुझ शून्यहृदयको यहां क्यों लाये” । यह सुनकर मकर आनन्दसे बोला,—“भद्र ! जो ऐसा है तो मुझको अपना हृदय दे जिससे वह दुष्टपत्नी भक्षण करके अनशन ( अभोजन ) से उठे । मैं तुझे उस जम्बूवृक्षको प्राप्त करता हूं” । ऐसा कह लोटकर जामन- वृक्षके नीचे गया । वानरभी किसी प्रकार विविध देवतोंकी सत्कार पूजाकी जल्पना कर तटपर आया । फिर बडी कुलांच मारकर उस जामनके पेडपर चढकर विचारने लगा । “अहो ! अब प्राण बचे । अथवा अच्छा कहा है—

न विश्वसेदविश्वस्ते विश्वस्तेऽपि न विश्वसेत् । विश्वासाद्भयमुत्पन्नं मूलान्यपि निकृन्तति ॥ १४ ॥

अविश्वासीका विश्वास न करे और विश्वासीकाभी विश्वास न करे विश्वाससे उत्पन्न हुआ भय जडसे नष्ट कर देता है ॥ १४ ॥