पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)
Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary
पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४१२ ) पञ्चतन्त्रम् ।
परिमाण द्रव्यको फिर देता है ( अर्थात् बलवानके थोडा मांगने पर न देनेसे फिर अधिक देना पडता है ) उपजाति वृत्त ॥ २७ ॥
तथाच-
और देखो-
सर्वनाशे समुत्पन्ने अर्द्धं त्यजति पण्डितः ।
अर्द्धेन कुरुते कार्य्यं सर्वनाशो हि दुस्तरः ॥ २८ ॥
सर्व नाश उत्पन्न होनेमें पंडित जन आधा त्याग देते हैं और आधेसे कार्य करते हैं, सर्व नाश बडा दुस्तर है ॥ २८ ॥
न स्वल्पस्य कृते भूरि नाशयेन्मतिमान्नरः ।
एतदेव हि पाण्डित्यं यत्स्वल्पाद्भूरिरक्षणम् ॥ २९ ॥”
बुद्धिमान् मनुष्य थोडेके निमित्त बहुतका नाश न करे यही चतुराई है कि थोडे देकर बहुतकी रक्षा करनी ॥ २९ ॥”
एवं निश्चित्य नित्यमेकैकं आदिशति । सोऽपि तं भक्षयित्वा तस्य परोक्षेऽन्यानपि भक्षयति । अथवा साधु इदमुच्यते-
ऐसा विचार कर नित्यही एक एक देने लगा । वहभी उसे भक्षण कर उसके पीछेमें औरोंकोभी भक्षण कर जाता । अथवा यह अच्छा कहा है-
यथा हि मलिनैर्वस्त्रैर्यत्र तत्रोपविश्यते ।
एवं चलितवित्तस्तु वित्तशेषं न रक्षति ॥ ३० ॥
जैसे मलीन वस्त्र पहरे हुए मनुष्य जहां तहां बैठ जाता है इस प्रकार निर्धन होनेपर यह प्राणी शेष धनकी भी रक्षा नहीं करता है ॥ ३० ॥
अथ अन्यदिने तेन अपरान् मण्डूकान् भक्षयित्वा गङ्गदत्तः सुतो यमुनादत्तो भक्षितः । तं भक्षितं ज्ञात्वा गङ्गदत्तः तारस्वरेण धिक् धिक् प्रलापपरः कथञ्चिदपि न विरराम । ततः स्वपत्न्या अभिहितः-
तब दूसरे दिन वह और मेंडकोंको भक्षण करके गंगदत्तके पुत्र यमुनादत्तको भी भक्षण कर गया उसको खाया हुआ जानकर गंगदत्त तारस्वरसे अपनेको धिक् धिक् करता हुआ किंचित् काल भी विश्रामको प्राप्त न हुआ। तब उसकी स्त्रीने कहा-