भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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भाषाटीकासमेतम् । ( ४१७ )

किसी स्थानमें करालकेशर ( कठिन गर्दनके वालवाला ) नामक सिंह रहता था, उसका धूसरक नाम शृगाल सदा अनुगामी परिचारक था । एक समय हाथीके साथ युद्ध करते उसके शरीरमे कठिन प्रहार पडगयेथे जिनसे एक पगभी चलनेको समर्थ नहीं था । उसके असमर्थ होनेसे वह धूसरक भी भूखसे व्याकुलकण्ठ दुर्बलताको प्राप्त होगया और किसी दिन उससे बोला-“स्वामिन् ! मैं भूखसे व्याकुल हो एक पगभी नहीं चल सकता । सो किस प्रकार तुम्हारी शुश्रूषा करूं” सिंह बोला-“भो ! जाकर कोई जीव ढूंढ जिससे इस अवस्थाको प्राप्त हुआ भी उसे मारूं” । यह सुन शृगाल खोज कर्त्ता किसी समीपवर्ती ग्राममे प्राप्त हुआ । वह लम्बकर्ण नामवाला गधा सरोवरके समीप लम्बायमान दूर्वादलके अंकुरोंकू कृच्छ्र ( कष्ट ) से खाता हुआ देखा । तब समीपवर्ती होकर उसने कहा-“मामा ! हमारा नमस्कार ग्रहण करो, बहुत दिनोंसे देखा है कहो क्यो ऐसे दुर्बल हो रहे हो ?” वह बोला “सो भान्जे ! क्या कहू यह निर्दयी धोबी अति बोझसे मुझको पीडा देताहै मुट्ठीभर घासभी नही देता । केवल धूलिमिले दूर्वाङ्कुर भक्षण करता हू तो कहासे मेरे शरीरमे पुष्टि होगी” । शृगाल बोला-“जो ऐसा है तो मरकतमणीकी समान शष्प ( घास ) वाला नदीके किनारे मनोहर स्थान है। वहा आकर मेरे साथ सुभाषित गोष्ठीका सुख अनुभवकर स्थित हो” । लम्बकर्ण बोला,-“भो भान्जे ! ठीक कहा तुमने । परन्तु हम ग्राम्य पशु वनचारियोंके वध्य हैं सो उस मनोहर स्थानसे क्या है ” शृगाल बोला-“मामा ! ऐसा मत कहो वह देश मेरे भुजपञ्जरसे रक्षित है । सो वहा किसी ओरका प्रवेश नहीं है किन्तु इसी दोषसे रजकसे क्लेशित हुई तीन गधी अनाथा वहा और भी हैं । वे पुष्टिको प्राप्त हुई जवानीसे उत्कट मुझसे यों बोलीं -“जो तू हमारा सत्य मामा है तो किसी ग्रामान्तरमें जाकर हमारे योग्य किसी स्वामीको लाओ” । उस कारण मैं तुमको वहा लिये जाता हू” । तब शृगालके वचन सुन कामसे पीडित अग हो उससे बोला-“भद्र ! जो ऐसा है तो आगे हो जिससे मैं वहा पहूचू । अथवा अच्छा कहा है-

नामृतं न विषं किञ्चिदेकां मुक्त्वा नितम्बिनीम् ।
यस्याः सङ्गेन जीव्येत म्रियेत च वियोगतः ॥ ३४ ॥

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