भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

पृष्ठ 446, कुल 536 में से

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भाषाटीकासमेतम् । ( ४३१ )

अर्दित हो ब्राह्मणी उसके पास जाकर बोली,-“भद्र ! यदि मेरी इच्छा नहीं करो तो मुझ आसक्तकी स्त्रीहत्या तुमको लगेगी” । लगडा बोला-“ व्याधीसे ग्रस्त मुझसे तू क्या करेगी ?” वह बोली इस कहनेसे क्या है । अवश्य तेरे सगमे सगम करूंगी” । यह सुनकर उसने वैसाही किया, सुरतके अंतमें वह बोली-“अबसे लेकर जीवन पर्यन्त अपना आत्मा मैंने तुम्हें दिया। ऐसा जानकर तुमभी हमारे साथ आओ”। वह बोला-“ऐसाही हो” तब ब्राह्मण भोजन लिये आकर उसके साथ खाने लगा। वह बोली-“यह लगडा भूखा है सो इसकोभी कुछ ग्रास प्रदान करो”। वैसा करनेपर फिर ब्राह्मणीने कहा-“हे ब्राह्मण! तुम सहायहीन होकर ग्रामान्तरको जाते हो।सो मेरा कोई वचनसहायकभी नहीं सो इस पंगुको लेचलें?” वह बोला-“मैं स्वयं अपनेसे अपने लेजानेको तौ समर्थ हूही नहीं । फिर इस पंगुको कैसे लेचलूगा ?” वह बोली-“गठरीके भीतर कर इसको मैं ले जाऊगी” । तब उसके बनावटी वचनोंसे मोहित चित्त होकर उसने वह सब अंगीकार किया । वैसा करनेपर एक दिन कूपके समीप विश्राम करते हुए ब्राह्मणको उस पंगुमें आसक्त चित्तवाली स्त्रीने कूपमें गिरा दिया । वहभी पंगुको ग्रहण कर किसी नगरमें प्रविष्ट हुई । वहां करके चुराजानेकी खोज रक्षाके निमित्त इधर उधर घूमते हुए राजपुरुषोंने उसके मस्तकपर वह गठरी देखी । और बलसे छीनकर राजाके आगे लेगये । राजानेभी जब उसे खोला तौ उसमें लगडेको देखा । तब वह ब्राह्मणी विलाप करती हुई राजपुरुषोंके पीछे २ वहा आई राजाने पूछा-“तेरा क्या वृत्तान्त है” वह बोली-“मेरा यह स्वामी रोगग्रस्त गोतियोंसे उद्वेजित हुआ है मैंने स्नेहसे व्याकुल मनसे शिरपर धारण कर आपके नगरमें प्राप्त किया है” । यह सुनकर राजा बोला-“ब्राह्मणि ! तू मेरी वहन दो ग्राम ग्रहण कर भर्ताके संग भोगोंको भोगती सुखसे रह” । उधर वह ब्राह्मण दैववशसे किसी साधुद्वारा कुएंसे निकाला हुआ, घूमता हुआ उसी नगरमें आया । और दुष्ट उस भार्याने देखकर राजासे कहा-“राजन् ! यह मेरे स्वामीका वैरी आया है” । राजाने उसके वधकी आज्ञा दी । वह बोला-“देव! इसने मेरा सक्त ( सक्रान्त वस्तु ) कुछ ग्रहण कर लिया है । जो तुम धर्मवत्सल हो तो दिलादो” । राजा बोला-“भद्रे ! जो तुमने इसका सक्त ( सक्रान्त ) कुछ लिया हो तो देना”| वह बोली-“देव! मैंने कुछ ग्रहण नहीं किया”| ब्राह्मण