पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)
Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary
पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४३२ ) पञ्चतन्त्रम् ।
बोला-“जो मैंने तीन वाचा देकर अपने जीवनका आधा दिया है वह दे”। तब वह राजाके भयसे “त्रिवाचित जीवित जो इसने दिया सो मैंने दिया” ऐसा कहती हुई प्राणरहित हुई । तब विस्मयसे राजा बोला-“यह क्याहै” । ब्राह्मणने सम्पूर्ण पहला वृत्तान्त उससे निवेदन किया । इससे मैं कहता हूं-
यदर्थे स्वकुलं त्यक्तं जीविताद्र्धञ्च हारितम् ।
सा मां त्यजति निःस्नेहा कः स्त्रीणां विश्वसेन्नरः ॥४७॥”
जिसके निमित्त कुल त्यागा, आधा जीवन दिया, उसने स्नेहरहित हो मुझे त्यागन करदिया, कौन मनुष्य स्त्रियोंका विश्वास करे ॥ ४७ ॥ ”
वानरः पुनराह-“साधु च इदमुपाख्यानकं श्रूयते ।
फिर वानरने कहा-“यह अच्छा उपाख्यान सुना जाता है ।
न किं दद्यान्न किं कुर्यात्स्त्रीभिरभ्यर्थितो नरः ।
अनश्वा यत्र हेषन्ते शिरः पर्वणि मुण्डितम् ॥ ४८ ॥ ”
स्त्रीसे प्राप्त हुआ मनुष्य क्या न दे और क्या नहीं करता है, अर्थात् सबही कुछ देता और करता है, जिस अवस्थामें घोडे न होकरभी हींसते है और और पर्व दिन चौदश अष्टमी आदि निषेधके दिनोंमेंभी शिरका मुण्डन होता है । स्त्रीके वशीभूत होकर कार्य अकार्यको नहीं जानता है ॥ ४८ ॥ ”
मकर आह-“कथमेतत् ?” वानरः कथयति-
मकर बोला-“वह कैसे ?” वानर कहने लगा-
कथा ७.
अस्ति प्रख्यातबलपौरुषोऽनेकनरेन्द्रमुकुटमरीचिजाल-जटिलीकृतपादपीठः शरच्छशांककिरणनिर्मलयशाः समुद्रपर्यन्तायाः पृथिव्या भर्त्ता नन्दो नाम राजा, तस्य सर्वशास्त्राधिगतसमस्ततत्त्वः सचिवो वररुचिर्नाम तस्य च प्रणयकलहेन जाया कुपिता । सा च अतीववल्लभा अनेकप्रकारं परितोष्यमाणापि न प्रसीदति ब्रवीति च भर्त्ता,-“भद्रे ! येन प्रकारेण तुष्यसि तं वद । निश्चितं करोमि” । ततः कथञ्चित् तया उक्तं,-“यदि शिरो मुण्डयित्वा मम पादयोः निपतसि, तदा प्रसादाभिमुखी भवामि”। तथा अनुष्ठिते