पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)
Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary
पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
( ४३२ ) पञ्चतन्त्रम् ।
बोला-“जो मैंने तीन वाचा देकर अपने जीवनका आधा दिया है वह दे”। तब वह राजाके भयसे “त्रिवाचित जीवित जो इसने दिया सो मैंने दिया” ऐसा कहती हुई प्राणरहित हुई । तब विस्मयसे राजा बोला-“यह क्याहै” । ब्राह्मणने सम्पूर्ण पहला वृत्तान्त उससे निवेदन किया । इससे मैं कहता हूं-
यदर्थे स्वकुलं त्यक्तं जीविताद्र्धञ्च हारितम् ।
सा मां त्यजति निःस्नेहा कः स्त्रीणां विश्वसेन्नरः ॥४७॥”
जिसके निमित्त कुल त्यागा, आधा जीवन दिया, उसने स्नेहरहित हो मुझे त्यागन करदिया, कौन मनुष्य स्त्रियोंका विश्वास करे ॥ ४७ ॥ ”
वानरः पुनराह-“साधु च इदमुपाख्यानकं श्रूयते ।
फिर वानरने कहा-“यह अच्छा उपाख्यान सुना जाता है ।
न किं दद्यान्न किं कुर्यात्स्त्रीभिरभ्यर्थितो नरः ।
अनश्वा यत्र हेषन्ते शिरः पर्वणि मुण्डितम् ॥ ४८ ॥ ”
स्त्रीसे प्राप्त हुआ मनुष्य क्या न दे और क्या नहीं करता है, अर्थात् सबही कुछ देता और करता है, जिस अवस्थामें घोडे न होकरभी हींसते है और और पर्व दिन चौदश अष्टमी आदि निषेधके दिनोंमेंभी शिरका मुण्डन होता है । स्त्रीके वशीभूत होकर कार्य अकार्यको नहीं जानता है ॥ ४८ ॥ ”
मकर आह-“कथमेतत् ?” वानरः कथयति-
मकर बोला-“वह कैसे ?” वानर कहने लगा-
कथा ७.
अस्ति प्रख्यातबलपौरुषोऽनेकनरेन्द्रमुकुटमरीचिजाल-जटिलीकृतपादपीठः शरच्छशांककिरणनिर्मलयशाः समुद्रपर्यन्तायाः पृथिव्या भर्त्ता नन्दो नाम राजा, तस्य सर्वशास्त्राधिगतसमस्ततत्त्वः सचिवो वररुचिर्नाम तस्य च प्रणयकलहेन जाया कुपिता । सा च अतीववल्लभा अनेकप्रकारं परितोष्यमाणापि न प्रसीदति ब्रवीति च भर्त्ता,-“भद्रे ! येन प्रकारेण तुष्यसि तं वद । निश्चितं करोमि” । ततः कथञ्चित् तया उक्तं,-“यदि शिरो मुण्डयित्वा मम पादयोः निपतसि, तदा प्रसादाभिमुखी भवामि”। तथा अनुष्ठिते
भाषाटीकासमेतम् । (४३३)
प्रसन्ना आसीत् । अथ नन्दस्य भार्यापि तथा एव रुष्टा प्रसाद्यमानापि न तुष्यति । तेन उक्तं,—“भद्रे ! त्वया विना मुहूर्त्तमपि न जीवामि, पादयोः पतित्वा त्वां प्रसादयामि”। सा अब्रवीत्—“यदि खलीनं मुखे प्रक्षिप्य अहं तव पृष्ठे समारुह्य त्वां धावयामि । धावितस्तु यदि अश्ववत हेषेसे, तदा प्रसन्ना भवामि” । राज्ञापि तथा एव अनुष्ठितम् । अथ प्रभातसमये सभायां उपविष्टस्य राज्ञः समीपे वररुचिः आयातः । तञ्च दृष्ट्वा राजा पप्रच्छ,—“भो वररुचे ! किं पर्व्वणि मुण्डितं शिरस्त्वया ?” सोऽब्रवीत्—
विख्यात बल पुरुषार्थवाला अनेक राजाओंके मुकुटोंके किरणजालसे सेवित चरणपीठवाला, शरत्कालके चन्द्रमाकी समान निर्मल यशवाला, सागर पर्य्यन्त पृथ्वीका स्वामी, नन्द नाम राजा था । उसके सम्पूर्ण शास्त्रके तत्व जाननेवाला वररुचि नाम मन्त्री था । उसकी स्त्री प्रेमके कलहमें क्रोधित हुई । वह बहुत प्यारी थी इस कारण अनेक प्रकार सन्तुष्ट करने परभी प्रसन्न न हुई । उसका भर्त्ता बोला—“भद्रे ! तुम किस कारणसे प्रसन्न होती हो ? सो कहो । अवश्य उसको मैं करू” तब किसी प्रकार उसने कहा—“यदि शिर मुँडाकर मेरे चरणोंमें गिरो तो मैं प्रसन्न होजाऊगी” । वैसा करनेपर वह प्रसन्न हुई । तब नन्दकी भार्याभी उसी प्रकार रूठकर किसी प्रकार सन्तुष्ट नहीं होती । उसने कहा—“भद्रे ! तेरे विना मैं मुहूर्त्त मात्रभी नहीं जी सकता । चरणमें पडकर तुझे प्रसन्न करता हूं” । वह बोली—“यदि मुखमें लगाम डालो और मैं तुम्हारे ऊपर चढ कर शीघ्रतासे तुम्हे चलाऊ । और दौडते हुए तुम घोड़ेकी समान शब्द करो तो मैं प्रसन्नहूँ” । राजानेभी वैसा किया । तब प्रातःकाल सभामें बैठे राजाके समीप वररुचि आया उसे देखकर राजाने पूछा—“अहो वररुचि ! किस पर्वमें तुमने शिर मुँडाया ?” वह बोला—
न किं दद्यान्न किं कुर्य्यात्स्त्रीभिरभ्यर्थितो नरः ।
अनश्वा यत्र हेषन्ते शिरः पर्व्वणि मुण्डितम् ॥ ४९ ॥
स्त्रीसे प्रार्थित हुआ मनुष्य क्या नहीं देता और क्या नहीं करता जहा घोड़े न होकरभी मनुष्य हींसते हैं उसी पर्व्वमेंभी शिर मुंडित हुआ है ॥ ४९ ॥
२८
( ४३४ ) पञ्चतन्त्रम् ।
तत् भो दुष्टमकर ! त्वमपि नन्दवररुचिवत् स्त्रीवश्यः ततो भद्र ! आगतेन त्वया मां प्रति वधोपायप्रयासः प्रारब्धः परं स्ववाग्दोषेण एव प्रकटीभूतः । अथवा साधु इदमुच्यते-
सो हे दुष्टजलचर ! तूभी नन्द और वररुचिकी समान स्त्रीके वशीभूत है । सो भद्र ! आतेही तुमने मेरे निमित्त वधके उपायका श्रम प्रारम्भ किया परन्तु तुम्हारी वाणीके दोषसेही वह प्रगट होगया है । अथवा यह अच्छा कहा है-
आत्मनो मुखदोषेण बध्यन्ते शुकसारिकाः ।
बकास्तत्र न बध्यन्ते मौनं सर्वार्थसाधनम् ॥ ५० ॥
तोते और मैना अपने मुख ( वाणी ) के दोषसे ही बन्धनमें पड़ते हैं और बगले नहीं बंधते मौनही सब अर्थका साधक है ॥ ५० ॥
तथाच-
और देखो-
सुगुप्तं रक्ष्यमाणोऽपि दर्शयन्दारुणं वपुः ।
व्याघ्रचर्मप्रतिच्छन्नो वाक्कृते रासभो हतः ॥ ५१ ॥”
गुप्त रक्षित हुआभी अपना दारुण शरीर दिखाता हुआ व्याघ्रके चर्मसे ढका गधा अपनी वाणीके दोषसे मारा गया ॥ ५१ ॥”
मकर आह-“कथमेतत् ?” वानरः कथयति-
मकर बोला-“यह कैसे ?” वानर कहने लगा-
कथा ८.
कस्मिंश्चित् अधिष्ठाने शुद्धपटो नाम रजकः प्रतिवसति स्म । तस्य च गर्दभः एकोऽस्ति, सोऽपि घासाभावात् अति दुर्बलतां गतः । अथ तेन रजकेन अटव्यां परिश्रमता मृत-व्याघ्रो दृष्टः । चिन्तितञ्च, “अहो ! शोभनमापतितम् । अनेन व्याघ्रचर्मणा प्रतिच्छाद्य रासभं रात्रौ यवक्षेत्रेषु उत्स्र-क्ष्यामि, येन व्याघ्रं मत्वा समीपवर्तिनः क्षेत्रपाला एनं न निष्कासयिष्यन्ति” । तथा अनुष्ठिते रासभो यथेच्छया यव-भक्षणं करोति प्रत्यूषे भूयोऽपि रजकः स्वाश्रयं नयति । एवं गच्छता कालेन स रासभः पीवरतनुर्जातः । कृच्छ्राद् बन्ध-
भाषाटीकासमेतम् । (४३५)
नस्थानमपि नीयते । अथ अन्यस्मिन् अहनि स मदोद्धतो दूरात् रासभीशब्दमशृणोत् । ततश्रवणमात्रेण एव स्वयं शब्दयितुमारब्धः । अथ ते क्षेत्रपाला रासभोऽयं व्याघ्रचर्म-प्रतिच्छन्न इति ज्ञात्वा लगुडशरपाषाणप्रहारैः तं व्यापादित-वन्तः । अतोऽहं ब्रवीमि-
किसी एक स्थानमें शुद्धपट नाम धोबी रहता था । उसका एक गधा था वह घासके बिना अतिदुर्बलताको प्राप्त हुआ । तब उस धोबीने वनमें घूमते हुए एक मरा व्याघ्र देखा विचाराभी, “ अहो ! बहुत अच्छा हुआ । इस व्याघ्र (चीते) के चमड़ेसे ढककर रात्रिमें गधेको जौके क्षेत्रमें छोड़ दूंगा । जिससे इसको व्याघ्र मानकर समीपवर्ती क्षेत्रपाल इसको न निकालेंगे” । ऐसा करनेपर गधा यथेच्छ धान्य खेत भक्षण करने लगा सवेरे धोबी उसे अपने स्थानमें लाता। इस प्रकार समय बीतनेपर गधा पुष्ट शरीर होगया । कठिनतासे बंधन स्थानमें ले जाया जाता । तब और दिन उस मदोद्धतने दूरसे गधैयाका शब्द सुना उसके सुनतेही वह स्वयं शब्द करने लगा । तब वे क्षेत्रपाल यह तो गधा है व्याघ्रचर्मसे ढका है ऐसा जानकर लठिया बाण तथा पत्थरके प्रहारोंसे उसे मारते हुए । इससे मैं कहता हूं-
सुगुप्तं रक्ष्यमाणोऽपि दर्शयन्दारुणं वपुः ।
व्याघ्रचर्मप्रतिच्छन्नो वाक्कृते रासभो हतः ॥ ५२ ॥ ”
अच्छी प्रकार रक्षा होकर भी अपना दारुण शरीर दिखाता हुआ व्याघ्रचर्मसे प्रच्छन्न हुआ गधा वाणीके दोषसे मारा गया ॥ ५२ ॥”
अथ एवं तेन सह वदतो मकरस्य जलचरेण एकेन आगत्य अभिहितं-“भो मकर ! त्वदीया भार्या अनशनो-पविष्टा त्वयि चिरयति प्रणयाभिभवाद्दिपन्ना” । एवं तद्वज्र-पातसदृशवचनमाकर्ण्य अतीव व्याकुलितहृदयः प्रलपितमेवं चकार । “अहो ! किमिदं संजातं मे मन्दभाग्यस्य । उक्तञ्च-
तब ऐसे उसके साथ कहते मकरके एक जलचरने आकर उससे कहा-“भो मकर ! तुम्हारी स्त्री अनशन व्रतमें बैठी हुई तुम्हारे चिरकालतक न आनेसे प्रेमकी अवमाननाके कारण मर गई” । इस प्रकार उसके वज्रघातकी समान
( ४३६ ) पञ्चतन्त्रम् ।
वचन सुनकर हृदयसे अति व्याकुल होकर वह इस प्रकार विलाप करने लगा । “यह मुझ मन्द भाग्यका क्या हुआ । कहा है-
माता यस्य गृहे नास्ति भार्या च प्रियवादिनी । अरण्यं तेन गन्तव्यं यथा रण्यं तथा गृहम् ॥ ५३ ॥
जिसके घरमें माता नहीं तथा प्रियवादिनी स्त्री नहीं उसको वनमें जाना उचित है कारण कि घर वनकाही समान है ॥ ५३ ॥
तत् मित्र ! क्षम्यतां, मया तेऽपराधः कृतः सम्प्रति अहं तु स्त्रीवियोगात् वैश्वानरप्रवेशं करिष्यामि" । तत् श्रुत्वा वानरः प्रहसन् प्रोवाच,—“भो ज्ञातः मया प्रथममेव यत्त्वं स्त्रीवश्यः स्त्रीजितश्च । साम्प्रतञ्च प्रत्ययः सञ्जातः । तत् मूढ ! आनन्देऽपि जाते त्वं विषादं गतः तादृग् भार्यायां मृतायां उत्सवः कर्तुं युज्यते, उक्तञ्च यतः-
सो मित्र ! क्षमा करना जो मैने आपका अपराध किया है मैं अब स्त्रीवियोगसे अग्निमें प्रवेश करूंगा” । यह सुन वानर हँसता हुआ बोला—“भो ! यह मैने पहलेही जाना था कि तू स्त्रीके वशीभूत और स्त्रीसे जीता गया है । अब विश्वास होगया । सो मूर्ख ! आनन्दके समयभी तू विषादको प्राप्त हुआ ऐसी स्त्रीके मरनेमें तो उत्सव करना चाहिये । कहा है कि-
या भार्या दुष्टचारित्रा सततं कलहप्रिया । भार्यारूपेण सा ज्ञेया विदग्धैर्दारुणा जरा ॥ ५४ ॥
जो भार्या दुष्ट चरित्र सदा क्लेश करनेवाली हो पंडितोंको वह स्त्रीरूप दारुण बुढापा जानना ॥ ५४ ॥
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन नामापि परिवर्जयेत् । स्त्रीणामिह हि सर्वासां य इच्छेत्सुखमात्मनः ॥ ५५ ॥
इस करण जो अपने सुखकी इच्छा करे वह स्त्रियोंके नामको भी त्याग-न करे ॥ ५५ ॥
यदन्तस्तन्न जिह्वायां यज्जिह्वायां न तद्वहिः । यच्चितं तन्न कुर्वन्ति विचित्रचरिताः स्त्रियः ॥ ५६ ॥
भाषाटीकासमेतम् । ( ४३७ )
जो मनमें है वह जिह्वा ( वचन )'में नहीं, जो जिह्वामें वह बाहर नहीं, जो हित है उसके करनेकी इच्छा नहीं करतीं, स्त्रियें अद्भुत चरित्रवाली हैं ॥ ५६ ॥
के नाम न विनश्यन्ति मिथ्याज्ञानान्नितम्बिनीम् ।
रम्यां य उपसर्पन्ति दीपाभां शलभा यथा ॥ ५७ ॥
अज्ञानसे मनोहर नितम्बवाली स्त्रीके निकट जाकर कौन नष्ट नहीं होते हैं दीपकी ज्योतिको प्राप्त होकर पतंग जैसे नहीं बचते ॥ ५७ ॥
अन्तर्विषमया ह्येता बहिश्चैव मनोरमाः ।
गुञ्जाफलसमाकाराः स्वभावादेव योषितः ॥ ५८ ॥
यह स्त्री भीतर विषरूप बाहरसे मनोहर हैं स्वभावसेही स्त्री चौंटलीके फलके आकारवाली हैं ॥ ५८ ॥
ताडिता अपि दण्डेन शस्त्रैरपि विखण्डिताः ।
न वशं योषितो यान्ति न दानैर्न च संस्तवैः ॥ ५९ ॥
दण्डसे ताडित और शस्त्रसे विखण्डित होकर तथा दान और स्तुतिसेभी स्त्री वशीभूत नहीं होती हैं ॥ ५९ ॥
आस्तां तावत्किमन्येन दौरात्म्येनेह योषिताम् ।
विधृतं स्वोदरेणापि घ्नन्ति पुत्रं स्वकं रुषा ॥ ६० ॥
स्त्रियोंकी और दुरात्मता इस संसारमे रहो अर्थात् अधिक क्या कहें यह क्रोधसे अपने उदरमें स्थित पुत्रकोभी मार देती हैं ॥ ६० ॥
रूक्षायां स्नेहसद्भावं कठोरायां सुमार्दवम् ।
नीरसायां रसं बालो बालिकायां विकल्पयेत् ॥ ६१ ॥”
मूर्ख ( पुरुष ) रूखीमें प्रेम सद्भाव, कठोरमें मृदुता, नीरसमे रस इन बालाओंमें कल्पना करता है ॥ ६१ ॥
मकर आह,—“भो मित्र ! अस्तु एतत्, परं किं करोमि, मम अनर्थद्वयमेतत् सञ्जातम् । एकस्तावत् गृहभंगः, अपरस्त्वद्विधेन मित्रेण सह चित्तविश्लेषः, अथवा भवति एवं दैवयोगात्, उक्तञ्च यतः—
मकरने कहा,—“भो मित्र ! है तो ऐसाही परन्तु मैं क्या करू मुझको यह दो अनर्थ हुए । एक तो घरका नाश दूसरे तुम्हारी समान मित्रका वियोग । अथवा दैव योगसे ऐसा होता ही है । कहा है—
( ४३८ ) पञ्चतन्त्रम् ।
यादृशं मम पाण्डित्यं तादृशं द्विगुणं तव।
नाभूज्जारो न भर्त्ता च किं निरीक्षसि नग्निके ॥६२॥”
जैसे मेरी पंडिताई है उससे दूनी तुम्हारी है केवल जार ( उपपति ) ही नहीं परंतु भर्त्ता भी नहीं हे बसनरहिते क्या देखती है ॥ ६२ ॥ ”
वानर आह,—“कथमेतत् ?” मकरोऽब्रवीत्–
वानर बोला,—“यह कैसी कथा ?” मकर बोला–
कथा ९.
कस्मिंश्चिदधिष्ठाने हालिकदम्पती प्रतिवसतः स्म । सा च हालिकभार्या पत्युर्वृद्धभावात् सदैव अन्यचित्ता न कथञ्चिद् गृहे स्थैर्यमालम्बते, केवलं परपुरुषान् अन्वेषमाणा परिभ्रमति । अथ केनचित् परवित्तापहारकेण धूर्तेन सा लक्षिता विजने प्रोक्ता च,—“सुभगे ! मृतभार्योऽहम् । त्वद्दर्शनेन स्मरपीडितश्च । तद्दीयतां मे रतिदक्षिणा,” ततः तयाभिहितं,—“भो सुभग ! यदि एवं तदस्ति मे पत्युः प्रभूतं धनं स च वृद्धत्वात् प्रचलितुमपि असमर्थः तत् । तद्धनमादाय अहमागच्छामि । येन त्वया सह अन्यत्र गत्वा यथेच्छया रतिसुखमनुभविष्यामि” । सोऽब्रवीत्,—“रोचते मह्यमपि एतत् । प्रत्यूषेऽत्र स्थाने शीघ्रमेव समागन्तव्यं येन शुभतरं किञ्चित् नगरं गत्वा त्वया सह जीवलोकः सफलीक्रियते” । सापि तथेति प्रतिज्ञाय प्रहसितवदना स्वगृहं गत्वा रात्रौ प्रसुप्ते भर्त्तरि सर्वं वित्तमादाय प्रत्यूषसमये तत कथितस्थानमुपादद्रवत् । धूर्तोऽपि तामग्रे विधाय दक्षिणां दिशमाश्रित्य सत्वरगतिः प्रस्थितः । एवं तयोः व्रजतोः योजनद्वयमात्रेण अग्रतः काचित् नदी समुपस्थिता । तां दृष्ट्वा धूर्तः चिन्तयामास, “किं अहमनया यौवनप्रान्ते वर्त्तमानया करिष्यामि । किंच कदापि अस्याः पृष्ठतः कोऽपि समेष्यति, तन्मे महान् अनर्थः स्यात् । तत् केवलमस्या वित्तं आदाय गच्छामि” इति निश्चित्य तामुवाच,—“प्रिये !
भाषाटीकासमेतम्। (४३९)
सुदुस्तरा इयं महानदी। तदहं द्रव्यमात्रं पारे धृत्वा समा- गच्छामि । ततः त्वां एकाकिनीं स्वपृष्ठमारोप्य सुखेन उत्ता- रयिष्यामि”। सा प्राह-“सुभग ! एवं क्रियताम्” इत्युक्त्वा अशेषं वित्तं तस्मै समर्पयामास।अथ तेन अभिहितं,-“भद्रे! परिधानाच्छादनवस्त्रमपि समर्पय, येन जलमध्ये निःशंका व्रजसि”। तथा अनुष्ठिते धूर्त्तो वित्तं वस्त्रयुगलञ्च आदाय यथाचिन्तितविषयं गतः। सापि कण्ठनिवेशितहस्तयुगल। सोद्वेगा नदीपुलिनदेशे उपविष्टा यावत् तिष्ठति, तावत् एत- स्मिन्नन्तरे काचित् शृगालिका मांसपिण्डगृहीतवदना तत्र आजगाम । आगत्य च यावत् पश्यति, तावत नदीतीरे महान् मत्स्यः सलिलात् निष्क्रम्य बहिःस्थित आस्ते। एतञ्च दृष्ट्वा सा मांसपिण्डं समुत्सृज्य तं मत्स्यं प्रति उपाद्रवत्। अत्रा- न्तरे आकाशात् अवतीर्य्य कोऽपि गृध्रस्तं मांसपिण्डमादाय पुनः खमुत्पपात । मत्स्योऽपि शृगालिकां दृष्ट्वा नद्यां प्रविवेश। सा शृगालिका व्यर्थश्रमा गृध्रं अवलोकयन्ती तया नग्नि- कया सस्मितं अभिहिता-
किसी स्थानमें हालिक स्त्री पुरुष रहते थे । वह हालिककी स्त्री पतिके वृद्ध होनेसे सदा औरकी चिन्ता करती किसी प्रकारभी घरमें स्थिरताको प्राप्त न होती । केवल परपुरुषको खोज कर स्थित थी । तब किसी पराया धन हरने-वाले धूर्तने उसे देख कर एकान्तमें कहा-“सुभगे ! मेरी स्त्री मरगई है । तेरे दर्शनसे मै कामसे पीडित हुआ हू । सो मुझे रति दक्षिणा दो” । तब उसने कहा-“भो सुभग ! जो ऐसा है तो मेरे पतिके बहुत धन है वृद्ध होनेसे वह चलनेको समर्थ नहीं है । सो उसका धन लेकर मै आती हू । जो तुम्हारे साथ और स्थानमें जाकर रतिका सुख अनुभव करू” । उसने कहा-“यह बात मुझेभी भली लगती है । प्रातःकाल इस स्थानमें तुम शीघ्र आना जिससे अच्छे किसी नगरमें जाकर तुम्हारे सग जीवन सफल करू” । वहभी बहुत अच्छा ऐसी प्रतिज्ञा कर हँसकर अपने घर जाय रात्रिमें पतिके सोजा नेपर सब धनको लेकर कथित स्थानमें आई । धूर्तभी उसे आगे लेकर दक्षिण दिशाको आश्रय
| ( ४४० ) | पञ्चतन्त्रम् । |
|---|
कर शीघ्रगतिसे चला । इस प्रकार उन दोनोंके जानेपर दो योजन चलकर कोई नदी आई । उसे देखकर धूर्त विचारने लगा "यौवनके नष्ट होनेसे इसे लेकर मैं क्या करूंगा । और कदाचित इसके पीछे कोई आवेगा । तो मेरा महान् अनर्थ होगा । सो केवल इसका धनही लेकर जाऊं" ऐसा विचार निश्चय कर उससे बोला,-"प्रिये ! यह महानदी दुस्तर है । सो पहले पार धन रखकर पीछे लोटूं । फिर मैं तुझे इकलीको पीठपर चढाकर सुखसे पार उतार दूंगा" । वह बोली-"सुभग ! ऐसाही करो" । ऐसा कह सम्पूर्ण धन उसको अर्पण करती हुई । तब उसने कहा-"भद्रे ! पहननेके वस्त्रभी अर्पण करो जिससे जलके बीचमें निश्शंक चलेगी" । ऐसा कह वह धूर्त धन और दोनों वस्त्र ( लहंगा दुपट्टा ) लेकर यथाभिलषित स्थानको गया । वहभी अपने कंठमें दोनों हाथ डाले उद्वेगसे नदीके किनारे जबतक बैठी रही । तबतक उसी समय कोई गीदडी मुखमें मांसपिण्ड ग्रहण किये वहां आई । आकर जबतक देखने लगी तबतक नदीके किनारे महामच्छ जलसे निकलकर बाहर स्थित था । यह देख वह मांसपिंडको छोड़ उस मत्स्यके प्रति धावमान हुई इसी समय आकाशसे उतर कर कोई गिद्ध उस मांसपिंडको लेकर फिर आकाशको धावमान हुआ । मत्स्य भी शृगालिकाको देखकर जलमें प्रवेशकर गया तत्र वह शृगाली व्यर्थश्रम होकर गृध्रको देखने लगी इस समय नक्रिकाने हँसकर कहा-
गृध्रेणापहृतं मांसं मत्स्योऽपि सलिलं गतः ।
मत्स्यमांसपरिभ्रष्टे किं निरीक्षसि जम्बुके ॥ ६३ ॥
गृध्रने मांस हरण किया मत्स्य भी जलमें गया हे जम्बुके ! मत्स्य और मांससे भ्रष्ट होकर अब क्या देखती है ॥ ६३ ॥
तच्छ्रुत्वा शृगालिका तामपि पतिधनजारपरिभ्रष्टां दृष्ट्वा सोपहासमाह-
यह सुनकर शृगालिकाने उस पति, धन और जारसे भ्रष्ट हुईको देखकर उपहाससे कहा-
"यादृशं मम पाण्डित्यं तादृशं द्विगुणं तव ।
माभूज्जारो न भर्त्ता च किं निरीक्षसि नग्निके ॥ ६४ ॥"
भाषाटीकासमेतम् । ( ४४१ )
जितना मेरा पांडित्य है तेरा उससे दूना है, हा जारभी गया और भर्त्ताभी नहीं हे नाग्रिके ! क्या देखती है ? ॥ ६४ ॥”
एवं तस्य कथयतः पुनरन्येन जलचरेण आगत्य निवेदितम्—“यदहो ! त्वदीयं गृहमपि अपरेण महामकरेण गृहीतम्” । तत् श्रुत्वा असौ अतिदुःखितमनाः तं गृहात् निःसारयितुं उपायं चिन्तयन् उवाच,—“अहो ! पश्यतां मे दैवोपहतत्वम् ।
इस प्रकार उसके कहनेपर फिर दूसरे जलचरने आकर कहा—“अहो ! तुम्हारा घरभी दूसरे महामकरने ग्रहण कर लिया” । उसे सुन यह दुःखीमनसे उसे घरसे निकालनेको उपाय विचारता हुआ बोला । मेरे प्रारब्धका घात तो देखो—
मित्रं ह्यमित्रतां यातमपरं मे प्रिया मृता ।
गृहमन्येन च व्याप्तं किमद्यापि भविष्यति ॥ ६५ ॥
मित्र अमित्र हुआ और प्रिया मेरी मरगई घर दूसरेको प्राप्त हुआ अब क्या होगा ! ॥ ६५ ॥
अथवा युक्तमिदमुच्यते—
अथवा यह युक्तही कहा है—
क्षते प्रहारा निपतन्त्यभीक्ष्ण-
मन्नक्षये वर्द्धति जाठराग्निः ।
आपत्सु वैराणि समुद्भवन्ति
वामे विधौ सर्वमिदं नराणाम् ॥ ६६ ॥
घावके ऊपर वारवार प्रहार पडते हैं, अन्नके क्षयमें भूख बढती है आपदा में वैरी बढते हैं, विधाताके वाम होनेमें मनुष्योंको यह सब कुछ होता है ॥ ६६ ॥
तत् किं करोमि ! किमनेन सह युद्धं करोमि ? किंवा साम्ना एव सम्बोध्य गृहात् निःसारयामि । किंवा भेदं दानं वा करोमि ? अथवा अमुमेव वानरमित्रं पृच्छामि ? उक्तञ्च—
सो क्या करू ! क्या उसके साथ युद्ध करू ? या साम उपायसे समझाकर घरसे निकालू ? अथवा भेद वा धनसे सन्तुष्ट करू ? अथवा इस वानर मित्रसे ही पूछू ? कहा है—
( ४४२ ) पञ्चतन्त्रम् ।
यः पृष्ट्वा कुरुते कार्य्यं प्रष्टव्यान्स्वहितान्गुरून् ।
न तस्य जायते विघ्नः कस्मिंश्चिदपि कर्मणि ॥ ६७ ॥
जो अपने पूछनेमें योग्य हितकारी गुरुओंसे पूछकर कार्य करता है उसको किसी काममें विघ्न नहीं होता है ॥ ६७ ॥”
एवं सम्प्रधार्य्य भूयोऽपि तमेव जम्बुवृक्षमारूढं कपिमपृच्छत्,–“भो मित्र ! पश्य मे मन्दभाग्यताम् । यत् सम्प्रति गृहमपि मे बलवत्तरेण मकरेण रुद्धम् । तदहं त्वां प्रष्टुमभ्यागतः । कथय किं करोमि ? । सामादीनाम् उपायानां मध्ये कस्य अत्र विषयः” । स आह–“भोः कृतघ्न ! पापचारिन् ! मया निषिद्धोऽपि किं भूयो मामनुसरसि, नाहं तव मूर्खस्य उपदेशमपि दास्यामि” । तच्छ्रुत्वा मकरः प्राह–“भो मित्र ! सापराधस्य मे पूर्वस्नेहमनुस्मृत्य हितोपदेशं देहि,” वानर आह–“न अहं ते कथयिष्यामि । यत् भार्य्यावाक्येन भवता अहं समुद्रे प्रक्षेप्तुं नीतः, तदेवं न युक्तं यद्यपि भार्य्या सर्वलोकादपि वल्लभा भवति तथापि न मित्राणि बान्धवाश्च भार्य्यावाक्येन समुद्रे प्रक्षिप्यन्ते । तन्मूर्ख ! मूढत्वेन नाशः तव मया प्रागेव निवेदित आसीत् । यतः–
ऐसा विचार फिर भी उस जामुनके वृक्षपर चढे वानरसे पूछने लगा--“भो मित्र ! मेरी मन्दभाग्यता तो देखो कि, इस समय घर भी मेरा बलवान् मकरने ग्रहण करलिया । सो मैं तुझसे पूछनेको आया हूं कह क्या करूं ? सामादि उपायोंमें इस समय कौन उचित है”। वह बोला,--“भो कृतघ्न पापिष्ठ ! मुझसे निषेधको प्राप्त हुआ भी फिर मुझसे क्यों पूछता है । मैं तुझ मूर्खको उपदेशभी नहीं दूंगा”। यह सुनकर मकर-बोला,--“भो मित्र ! मैं अपराधीहूं पर मेरा पूर्वस्नेह स्मरण कर हितोपदेश दे”। वानरने कहा,--“मैं तुझसे नहीं कहूंगा । जो भार्य्यावाक्यसे तुम मुझे समुद्रमें डालनेको लेगये थे सो युक्त नहीं किया । यद्यपि भार्य्या सर्व लोकसे भी प्यारी होती है तथापि मित्र और बन्धु भार्य्याके वाक्यसे सागरमें नहीं डाले जाते हैं सो मूर्ख ! मूढ होनेसे तेरा नाश मैंने प्रथमही कह दियाथा । क्यों कि–
भाषाटीकासमेतम् । ( ४४३ )
सतां वचनमादिष्टं मदेन न करोति यः ।
स विनाशमवाप्नोति घण्टोष्ट्र इव सत्वरम् ॥ ६८ ॥”
जो मदसे सत्पुरुषोके कहे वचन नहीं करता है वह घण्टा बन्धे ऊँटकी समान शीघ्र नाशको प्राप्त होता है ॥ ६८ ॥”
मकर आह,—“कथमेतत् ?” सोऽब्रवीत्-
मकर बोला,—“यह कैसे ?” वह बोला—
कथा १०.
कस्मिंश्चिदधिष्ठाने उज्ज्वलको नाम रथकारः प्रतिवसति स्म । स च अतीव दारिद्र्योपहतः चिन्तितवान्— “अहो ! धिक् इयं दरिद्रता अस्मद्गृहे । यतः सर्वोऽपि जनः स्वकर्मणि एव रतः तिष्ठति । अस्मदीयः पुनर्व्यापारो न अत्र अधिष्ठाने अर्हति । यतः सर्वलोकानां चिरन्तनाः चतुर्भूमिका गृहाः सन्ति । मम च नात्र, तत् किं मदीयेन रथकारत्वेन प्रयोजनम्” इति चिन्तयित्वा देशात् निष्क्रान्तः । यावत् किञ्चित् वनं गच्छति तावत् गहराकारवनगहनमध्ये सूर्य्यास्तमनवेलायां स्वयूथाद् भ्रष्टां प्रसववेदनया पीड्यमानां उष्ट्रीमपश्यत्, स च दासेरकयुक्तामुष्ट्रीं गृहीत्वा स्वस्थानाभिमुखः प्रस्थितः । गृहमासाद्य रज्जुं गृहीत्वा तामुष्ट्रीकां बबन्ध । ततश्च तीक्ष्णं परशुमादाय तस्याः कृते पल्लवानयनार्थं पर्वतैकदेशे गतः । तत्र च नूतनानि कोमलानि बहूनि पल्लवानि छित्वा शिरसि समारोप्य तस्या अग्रे निचिक्षेप । तया च तानि शनैः शनैः भक्षितानि । पश्चात् पल्लवभक्षणप्रभावादहर्निशं पीवरतनुः उष्ट्री सञ्जाता । सोऽपि दासेरको महान् उष्ट्रः सञ्जातः । ततः स नित्यमेव दुग्धं गृहीत्वा स्वकुटुम्बं परिपालयति । अथ रथकारेण वल्लभत्वात् दासेरकग्रीवायां महती घण्टा प्रतिबद्धा । पश्चात् रथकारो व्यचिन्तयत,—“अहो ! किमन्यैः दुष्कृतकर्मभिः यावत् मम
( ४४४ ) पञ्चतन्त्रम् ।
एतस्मादेव उष्ट्रीपरिपालनात् अस्य कुटुम्बस्य भव्यं सञ्जातम् । तत् किं अन्येन व्यापारेण" । एवं विचिन्त्य गृहमागत्य प्रियामाह,—"भद्रे ! समीचीनोऽयं व्यापारः तव सम्मतिःचेत् कुतोऽपि धनिकात् किंचित द्रव्यमादाय मया गुर्जूरदेशे गन्तव्यं करभग्रहणाय । तावत् त्वया एतौ यत्नेन रक्षणीयौ । यावत् अहमपरामूष्ट्रीं गृहीत्वा समागच्छामि" । ततश्च गुर्जरदेशं गत्वा उष्ट्रीं गृहीत्वा स्वगृहं आगतः । किं बहुना, तेन तथा कृतं यथा तस्य प्रचुरा उष्ट्राः करभाश्च सम्मिलिताः । ततस्तेन महदुष्ट्रयूथं कृत्वा रक्षापुरुषो धृतः । तस्य वर्ष प्रति वृत्त्या करभं एकं प्रयच्छति । अन्यच्च अहर्निशं दुग्धपानं तस्य निरूपितम् । एवं रथकारोऽपि नित्यमेव उष्ट्रीकरभव्यापारं कुर्वन् सुखेन तिष्ठति । अथ ते दासेरका अधिष्ठानोपवने आहारार्थं गच्छन्ति । कोमलवलीः यथेच्छया भक्षयित्वा महति सरसि पानीयं पीत्वा सायन्तनसमये मन्दं मन्दं लीलया गृहं आगच्छन्ति । स च पूर्वदासेरको मदातिरेकात् पृष्ठे आगत्य मिलति । ततस्तैः कलभैः अभिहितः—"अहो ! मन्दमतिः अयं दासेरको यथा यूथाद्भ्रष्टः पृष्ठे स्थित्वा घण्टां वादयन् आगच्छति । यदि कस्यापि दुष्टसत्त्वस्य मुखे पतिष्यति, तन्नूनं मृत्युमवाप्स्यति" । अथ तस्य तद्वनं गाहमानस्य कश्चित् सिंहो घण्टारवं आकर्ण्य समायातः । यावत् अवलोकयति, तावत् उष्ट्रीदासेरकाणां यूथं गच्छति। एकस्तु पुनः पृष्ठे क्रीडां कुर्वन् वल्लरीश्चरन् यावत् तिष्ठति, तावत् अन्ये दासेरकाः पानीयं पीत्वा स्वगृहे गताः । सोऽपि वनात् निष्क्रम्य यावद्दिशोऽवलोकयति, तावत् न कश्चित् मार्गं पश्यति वेत्ति च । यूथाद्भ्रष्टो मन्दं मन्दं बृहच्छब्दं कुर्वन् यावत् कियद्दूरं गच्छति, तावत् तच्छब्दानुसारी सिंहोऽपि क्रमं कृत्वा निभृतोऽग्रे व्यवस्थितः । ततः यावत् उष्ट्रः समीपं आगतः तावत् सिंहेन लम्पयित्वा ग्रीवायां गृहीतो मारितश्च । अतोऽहं ब्रवीमि—
भाषाटीकासमेतम् । (४४५)
किसी स्थानमें उज्ज्वल नाम रथकार रहता था । वह अति दरिद्र होकर विचारने लगा । "अहो हमारे घरकी दरिद्रताको धिक्कार है । जो कि सम्पूर्ण मनुष्य अपने कर्ममे रत हुए स्थित हैं । हमारा कार्य्य तो इस स्थानमें नहीं चलता । जो कि सम्पूर्ण लोकोंके पुराने चार कोष्ठके घर हैं । मेरा नहीं है सो क्या मेरे रथकार होनेसे प्रयोजन है" । ऐसा विचार कर देशसे चलागया । जभी कुछ दूर वनमें पहुंचा कि, सूर्य्यके अस्त समय अपने यूथसे भ्रष्ट हुई प्रसवपीडासे युक्त एक ऊटनीको देखा । वह उस बच्चेसे युक्त ऊटनीको लेकर अपने घरको चला, घरमें प्राप्त हो रस्सी ले उससे उस ऊटनीको बांधता हुआ । तीव्र (तीक्ष्ण) कुल्हाडीको लेकर उसके निमित्त पत्ते लेनेको पर्वतके एक स्थानमें गया। वहा नूतन कोमल बहुतसे पत्ते छेदनकर शिरपर धारणकर उसके आगे डाल देता हुआ । वहभी उनको शनैः २ भक्षण करने लगी तब रातदिन पल्लव भक्षणके प्रभावसे पुष्ट शरीर ऊटनी होगई । और दासेरकभी महान् ऊट होगया। तबतक नित्यही दूधको ग्रहणकर अपने कुटुम्बकी पालना करता । तब रथकारने प्यारके कारण ऊटके बच्चेकी गर्दनमें बडा घंटा बांध दिया । पीछे रथकार विचारने लगा । "अहो ! और दुष्कृत कर्मोंसे क्या है जबसे मैं इस ऊटके पालन करने लगा उससे इस कुटुम्बकी कुशल हुई सो अब और व्यापारसे क्या है" ऐसा विचार घर आनकर अपनी प्रियासे बोला-"भद्रे ! यह व्यापार अच्छा है । जो तेरी सम्मति हो तौ किसी धनीसे कुछ द्रव्य लाकर मैं ऊटके बच्चे ग्रहण करनेको गुर्जर देशमें जाऊगा । तबतक तू इन दोनोंकी यत्नसे रक्षा कर । जबतक मैं और ऊटनीको लाऊ "। तब वह गुर्जर देशमें जाय ऊटनीको ग्रहणकर अपने घर आया । बहुत कहनेसे क्या है उसने वह किया जो उसके बहुतसे ऊटके बच्चे होगये । तब उसने बडा ऊटोंका यूथ कर एक रक्षा पुरुष रक्खा । उस रक्षकको नौकरीमें प्रतिवर्ष एक ऊटका बच्चा देता । और प्रतिदिन दूधपानभी उसको निरूपण करदिया । इस प्रकार रथकार नित्यही ऊटनी ऊटके बच्चोंका व्यापार करता सुखसे स्थित था । और वे ऊटके बच्चे घरके उपवनमे भोजनको जाते । कोमल बेलें यथेच्छ भोजनकर बडे सरोवरमे पानी पीकर संध्यासमय मन्द २ लीलासे घरको आते । और वह पहला बच्चा मदके अधिक होनेसे पीछे आकर मिलता । तब उन बच्चोंने कहा-"अहो ! यह बच्चा वडा
( ४४६ ) पञ्चतन्त्रम् ।
मन्दमति है जो यूथसे भ्रष्ट हो पीछे स्थित होकर घण्टेको बजाता हुआ आता है और जो कहीं किसी दुष्ट जीवके मुखमें गिरा तो अवश्य मरेगा।” । तब उसके उस वनमें फिरते हुए कोई सिंह घण्टेका शब्द सुनकर आया । जब आकर देखा कि ऊंटके बच्चोंका समूह जाता है । और एक पीछे क्रीडा करताहुआ बेल खाताहुआ जबतक स्थित है तवतक और ऊंटके बच्चे पानी पीकर अपने घर गये । वह भी वनसे निकलकर जबतक दिशाओंको देखता है तवतक न कोई मार्गको देखता वा जानता है (सन्ध्याके कारण अन्धकार हुआ) यूथसे भ्रष्ट हुआ बड़ा शब्द करता जबतक् मन्द २ कुछ दूर चला तवतक उस शब्दका अनुसारी सिंहभी तैयार हो एकान्तमें आगे स्थित हुआ । सो जबतक ऊंट निकट आया । तब सिंहने कूदकर उसकी गर्दन पकड़कर मारडाला । इससे मैं कहता हूं—
सतां वचनमादिष्टं मदेन न करोति यः ।
स विनाशमवाप्नोति घण्टोष्ट्र इव सत्वरम् ॥ ६९ ॥”
सत्पुरुषोंके कहे वचनको जो मदसे नहीं करता है वह घण्टा बंधे ऊटकी समान विनाशको प्राप्त होता है ॥ ६९ ॥”
अथ तच्छ्रुत्वा मकरः प्राह,—“भद्र–
यह सुनकर मकर बोला-“भद्र–
प्राहुः सातपदं मैत्रं जनाः शास्त्रविचक्षणाः ।
मित्रताञ्च पुरस्कृत्य किञ्चिद्वक्ष्यामि तच्छृणु ॥ ७० ॥
शास्त्रमें चतुर मनुष्य सातपदिककोही मित्रता कहते हैं सो मित्रताको आगे कर जो कुछ मैं कहताहूं सो सुन ॥ ७० ॥
उपदेशप्रदातॄणां नराणां हितमिच्छताम् ।
परास्मिन्निह लोके च व्यसनं नोपपद्यते ॥ ७१ ॥
हितकी इच्छासे उपदेश करनेवाले मनुष्योंको परलोक और इस लोकमें दुःख नहीं होता है ॥ ७१ ॥
तत सर्वथा कृतघ्नस्यापि मे कुरु प्रसादं उपदेशप्रदानेन ।
उक्तञ्च–
सो सर्वथा मुझ कृतघ्नरपरभी उपदेश दानकरके प्रसन्नता करो । कहा है कि—
भाषाटीकासमेतम्। ( ४४७ )
उपकारिषु यः साधुः साधुत्वे तस्य को गुणः । अपकारिषु यः साधुः स साधुः सद्भिरुच्यते ॥ ७२ ॥”
जो उपकारियोंमें साधु है उसके साधुतामें क्या गुण है ?-जो अपकारियोंपर कृपा करे महात्माओंने उसेही साधु कहा है ॥ ७२ ॥”
तदाकर्ण्य वानरः प्राह,-“भद्र! यदि एवं तर्हि तत्र गत्वा तेन सह युद्धं कुरु । उक्तञ्च-
यह सुनकर बानर बोला-“भद्र ! जो ऐसा है तो जाकर उसके संग युद्ध कर-
हतस्त्वं प्राप्स्यसि स्वर्गं जीवन् गृहमथो यशः । युद्ध्यमानस्य ते भावि गुणद्वयमनुत्तमम् ॥ ७३ ॥
मरनेसे स्वर्गको प्राप्त होगा, जीनेसे गृह और यशको प्राप्त होगा, युद्ध करनेसे तुझको दोनो प्रकार श्रेष्ठ गुण प्राप्त होंगे ॥ ७३ ॥
उत्तमं प्रणिपातेन शूरं भेदेन योजयेत् । नीचमल्पप्रदानेन समशक्तिं पराक्रमैः ॥७४॥
उत्तमको प्रणाम करके, शूरको भेद करके, नीचको कुछ देकर युक्त करे और समान बलवालेसे युद्ध करै ॥ ७४ ॥”
मकरः प्राह,-“कथमेतत् ?” सोऽब्रवीत्,-
मकर बोला,-“यह कैसे ?” वह बोला-
कथा ११.
आसीत् कस्मिंश्चित् वनोद्देशे महाचतुरको नाम शृगालः। तेन कदाचित् अरण्ये स्वयं मृतो गजः समासादितः । तस्य समन्तात् परिभ्रमति परं कठिनां त्वचं भेत्तुं न शक्नोति । अथ अत्र अवसरे इतश्चेतश्च विचरन् कश्चित् सिंहस्तत्रैव प्रदेशे समाययौ । अथ सिंहं समागतं दृष्ट्वा स क्षितितलविन्यस्त-मौलिमण्डलः संयोजितकरयुगलः सविनयमुवाच,-“स्वा-मिन् ! त्वदीयोऽहं लागुडिकः स्थितः त्वदर्थे गजमिमं रक्ष्या-मि । तत् एनं भक्षयतु स्वामी” । तं प्रणतं दृष्ट्वा सिंहः-
( ४४८ ) पञ्चतन्त्रम् ।
प्राह,—"भोः ! न अहमन्येन हतं सत्त्वं कदाचिदपि भक्ष- यामि । उक्तञ्च—
किसी वनमें महा चतुरक नाम शृगाल रहताथा । उसको एक समय वनमें स्वयं मृतक हुआ हाथी मिला । उसके चारों ओर घूमा परन्तु उसकी कठिन त्वचा भंग करनेको समर्थ न हुआ । इसी समय इधर उधर विचारण करता कोई सिंह वहां आया, तब सिंहको आया हुआ देखकर यह पृथ्वीमें अपना शिर धरकर दोनों हाथ जोडकर विनयपूर्वक बोला,—"स्वामिन् ! मैं आपकी लकडी धारणकरनेवाला स्थित हूं आपहीके निमित्त इस हाथीकी रक्षा करता हूं । सो स्वामी इसको भक्षण करे" । उस प्रणाम करते हुएको देखकर सिंह बोला,—"भो ! मैं दूसरेके मारे हुए जीवको कभी भक्षण नहीं करता हूं । कहा है कि—
वनेऽपि सिंहा मृगमांसभक्ष्या बुभुक्षिता नैव तृणं चरन्ति । एवं कुलीना व्यसनाभिभूता न नीतिमार्गं परिलङ्घयन्ति ॥ ७५ ॥
वनमें भी सिंह मृगके मांसका भक्षण करते हैं भूखे होकरभी तृण नहीं खाते हैं, इसी प्रकार कुलके मनुष्य व्यसनसे तिरस्कृत होकर भी नीतिमार्गको उल्लंघन नहीं करते हैं ॥ ७५ ॥
तत् तव एव गजोऽयं मया प्रसादीकृतः" तत् श्रुत्वा शृगालः सानन्दमाह,—"युक्तमिदं स्वामिनो निजभृत्येषु । उक्तञ्च यतः—
सो यह हाथी तुमको मैंने प्रसन्नतारूपसे दिया है" । यह सुनकर शृगाल आनंदित होकर बोला,—"स्वामीको अपने भृत्योंमें यह बात उचितही है । जिससे कि कहा है—
अन्त्यावस्थोऽपि महान्स्वामिगुणान्न जहाति शुद्धतया । न श्वेतभावमुञ्झति शंखः शिखिभुक्तिमुक्तोऽपि ॥ ७६ ॥
अन्त्य अवस्थाको प्राप्त हुआ भी महान् पुरुष शुद्धतासे स्वामीके गुणोंको नहीं त्यागता है जैसे शुद्ध करनेको अग्निमें भस्मकर निकाला हुआ शंख अपनी श्वेतताको नहीं त्यागता है ॥ ७६ ॥
अथ सिंहे गते कश्चिद् व्याघ्रः समाययौ, तमपि दृष्ट्वा असौ व्यचिन्तयत् । "अहो ! एकस्तावत् दुरात्मा प्रणिपातेन
भाषाटीकासमेतम् । (४४९)
अपवाहितः । तत् कथमिदानीम् एनमपवाहयिष्यामि । नूनं शूरोऽयम्, न खलु भेदं विना साध्यो भविष्यति । उक्तञ्च यतः-
तब सिंहके जानेपर कोई चीता वहा आया । उसको भी देखकर यह विचारने लगा । “एक दुरात्माको तो प्रणामकर भगाया । सो अब किस प्रकार इसको यहासे दूर करू । निश्चयही यह शूर है भेदके विना साध्य नहीं होगा । जिस कारण कहा है कि-
न यत्र शक्यते कर्तुं साम दानमथापि वा ।
भेदस्तत्र प्रयोक्तव्यो यतः स वशकारकः ॥ ७६ ॥
जहा साम, दान करनेको यह प्राणी समर्थ न हो वहा भेदका प्रयोग करे कारण कि यही वशमें करनेवाला है ॥ ७६ ॥
किञ्च, सर्वगुणसम्पन्नोऽपि भेदेन बध्यते । उक्तञ्च यतः-
क्यों कि सर्व गुणसम्पन्न भी भेदसे बंधता है । कहा है कि-
अन्तःस्थेन विरुद्धेन सुवृत्तेनातिचारुणा ।
अन्तर्भिन्नेन सम्प्राप्तं मौक्तिकेनापि बन्धनम् ॥ ७७ ॥
अन्तरमें स्थित विरुद्ध सुडोल होनेसे मनोहर भीतरसे भिन्न होनेके कारण मोती भी बन्धनको प्राप्त होता है । अथवा अन्तर्गत (दुर्गमें स्थित) सुचरित्र, लोक रजन करनेवाले आवरणसे युक्त अभ्यन्तरसे भिन्न प्रजासे उपजापको प्राप्त हुए औरों करके आत्मा बंधनको प्राप्त किया जाता है ॥ ७७ ॥
एवं सम्प्रधार्य तस्याभिमुखो भूत्वा गर्वात् उन्नतकन्धरः ससम्भ्रमम् उवाच,—“माम ! कथं अत्र भवान् मृत्युमुखे प्रविष्टः येन एष गजः सिंहेन व्यापादितः । स च माम् एतद्रक्षणे नियुज्य नद्यां स्नानार्थं गतः । तेन च गच्छता मम समादिष्टं,—“यदि कश्चिदिह व्याघ्रः समायाति, तत् त्वया सुगुप्तं मम आवेदनीयम् । येन वनमिदं मया निर्व्याघ्रं कर्त्तव्यम् । यतः पूर्वं व्याघ्रेण एकेन मया व्यापादितो गजः शून्ये भक्षयित्वा उच्छिष्टतां नीतः । तद्दिनात् आरभ्य
२९
| ( ४५० ) | पञ्चतन्त्रम् । |
|---|
व्याघ्रान् प्रति प्रकुपितोऽस्मि” । तत् श्रुत्वा व्याघ्रः सन्त्रस्तः तमाह,–“भो भागिनेय ! देहि मे प्राणदक्षिणाम् । त्वया तस्य अत्र चिराय आयातस्यापि मदीया कापि वार्त्ता न आख्येया” । एवमभिधाय सत्वरं पलायाञ्चक्रे । अथ गते व्याघ्रे तत्र कश्चित् द्वीपी समायातः । तमपि दृष्ट्वा असौ व्यचिन्तयत्,–“दृढदंष्ट्रोऽयं चित्रकः, तदस्य पार्श्वदस्य गजस्य यथा चर्मच्छेदो भवति तथा करोमि” । एवं निश्चित्य तमपि उवाच,–“भो भगिनीसुत ! किमिति चिरात् दृष्टोऽसि ? कथञ्च बुभुक्षित इव लक्ष्यसे ? तत् अतिथिरसि मे । एष गजः सिंहेन हतः तिष्ठति । अहं च अस्य तदादिष्टो रक्षपालः । परं तथापि यावत् सिंहो न समायाति, तावत् अस्य गजस्य मांसं भक्षयित्वा तृप्तिं कृत्वा द्रुततरं व्रज” । स आह,–“माम ! यदि एवं तन्न कार्यं मे मांसाशनेन, यतो जीवन्नरो भद्रशतानि पश्यति । उक्तञ्च–
ऐसा विचार कर उसके सामने होकर गर्वसे ऊंचे कन्धे कर संभ्रमसे बोला,–“मामा ! आप कैसे यहां मृत्युमुखमें प्रविष्ट हुए हो ? जिस सिंहने इस हाथीको मारा है वह मुझे इसकी रक्षामें नियुक्त कर स्नान करनेको नदीके किनारे गया है । उसने जाते हुए मुझसे कहा–“जो कोई मेरे पीछे व्याघ्र आये तो तू मुझे गुस्सासे कह देना । क्यों कि यह वन मैं व्याघ्ररहित करदूंगा । कारण पहले एक व्याघ्रने मेरा मारा हुआ हाथी एकान्तमें भक्षण कर उच्छिष्ट करदिया । उसदिनसे मैं व्याघ्रोंपर क्रोधित हुआ हूं” । यह सुन व्याघ्र उससे घबडाकर बोला,–“भो भानजे ! मुझे प्राणदक्षिणा दे तुझे यहां उसके देरमें आनेपर भी मेरी कोई बात न कहनी” । ऐसा कह शीघ्र पलायन करगया । तब व्याघ्रके जानेमें कोई शार्दूल वहां आया । उसे देखकर यह विचारने लगा,–“यह शार्दूल दृढ दाढोंवाला है । सो इसके निकटसे जैसे हाथीका चर्मछेद हो वैसा करूं । ऐसा विचार कर उससे बोला,–“भो भानजे! क्या कारण है बहुत दिनोंमें तुझको देखा । क्या भूखेकी समान दीखता है ? । सो मेरा अतिथि है । यह हाथी सिंहसे मरा पडा है । मैं उसकी आज्ञासे इसकी
भाषाटीकासमेतम् । ( ४५१ )
रक्षा करता हू । पर तौ भी जबतक कि सिंह नहीं आता है, तबकत इस हाथीका मास भक्षण कर तृप्तिको प्राप्त होकर शीघ्र जा” । वह बोला-“मामा ! जो ऐसा है तो मुझे मासभक्षणसे प्रयोजन नहीं, कारण कि जीता रहे तो मनुष्य सेकडों मगलोंको देखता है । कहा है कि-
यच्छक्यं ग्रसितुं ग्रासं ग्रस्तं परिणमेच्च यत् ।
हितञ्च परिणामे यत्तदाद्यं भूतिमिच्छता ॥ ७८ ॥
मनुष्य जो ग्रास ग्रसनेको समर्थ हो और जो खानेसे पच जाय परिणाममें हितकारी हो ऐश्वर्य्यकी इच्छा रखने वालेको वह भोजन करना चाहिये ॥ ७८ ॥
तत् सर्वथा तदेव भुज्यते यदेव परिणमति । तत् अहमितोऽपयास्यामि” । शृगाल आह,-“भो अधीर ! विश्रब्धो भूत्वा भक्षय त्वं, तस्य आगमनं दूरतोऽपि तव अहं निवेदयिष्यामि” । तथा अनुष्ठिते द्वीपिना भिन्नां त्वचं विज्ञाय जम्बूकेन अभिहितम्-“भो भगिनीसुत ! गम्यताम्, एष सिंहः समायाति” । तत् श्रुत्वा चित्रको दूरं प्रविष्टः । अथ यावदसौ तद्भेदकृतद्वारेण किंचिन्मांसं भक्षयति, तावत् अतिसंक्रुद्धोऽपरः शृगालः समाययौ । अथ तम् आत्मतुल्यपराक्रमं दृष्ट्वा एनं श्लोकमपठत्-
सो जो पचजाय सर्वथा उसीको खाना अच्छा है । सो मैं यहासे जाता हूँ” । शृगाल बोला-“भो अधीर ! निडर होकर तू भक्षण कर । उसका आगमन दूरसेभी मैं तुझसे कहदूगा” । ऐसा करने पर शार्दूलसे खाल फाडी हुई जानकर शृगालने कहा-“भो भानूजे ! जाओ यह सिंह आरहाहै” । यह सुन चित्रक दूर भाग गया । सो जबतक यह उस भेदन किये द्वारसे मास खाने लगा तबतक अतिक्रोध किये दूसरा शृगाल आया तब उसने अपनी तुल्य पराक्रममें उसे जानकर यह श्लोक पढा-
उत्तमं प्रणिपातेन शूरं भेदेन योजयेत् ।
नीचमल्पप्रदानेन समशक्तिं पराक्रमैः ॥ ७९ ॥
उत्तमको प्रणाम कर, शूरको भेद करके, नीचको कुछ देकर और समान शक्तिको पराक्रमसे युक्त करे ॥ ७९ ॥