पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)
Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary
पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम् । ( ४५१ )
रक्षा करता हू । पर तौ भी जबतक कि सिंह नहीं आता है, तबकत इस हाथीका मास भक्षण कर तृप्तिको प्राप्त होकर शीघ्र जा” । वह बोला-“मामा ! जो ऐसा है तो मुझे मासभक्षणसे प्रयोजन नहीं, कारण कि जीता रहे तो मनुष्य सेकडों मगलोंको देखता है । कहा है कि-
यच्छक्यं ग्रसितुं ग्रासं ग्रस्तं परिणमेच्च यत् ।
हितञ्च परिणामे यत्तदाद्यं भूतिमिच्छता ॥ ७८ ॥
मनुष्य जो ग्रास ग्रसनेको समर्थ हो और जो खानेसे पच जाय परिणाममें हितकारी हो ऐश्वर्य्यकी इच्छा रखने वालेको वह भोजन करना चाहिये ॥ ७८ ॥
तत् सर्वथा तदेव भुज्यते यदेव परिणमति । तत् अहमितोऽपयास्यामि” । शृगाल आह,-“भो अधीर ! विश्रब्धो भूत्वा भक्षय त्वं, तस्य आगमनं दूरतोऽपि तव अहं निवेदयिष्यामि” । तथा अनुष्ठिते द्वीपिना भिन्नां त्वचं विज्ञाय जम्बूकेन अभिहितम्-“भो भगिनीसुत ! गम्यताम्, एष सिंहः समायाति” । तत् श्रुत्वा चित्रको दूरं प्रविष्टः । अथ यावदसौ तद्भेदकृतद्वारेण किंचिन्मांसं भक्षयति, तावत् अतिसंक्रुद्धोऽपरः शृगालः समाययौ । अथ तम् आत्मतुल्यपराक्रमं दृष्ट्वा एनं श्लोकमपठत्-
सो जो पचजाय सर्वथा उसीको खाना अच्छा है । सो मैं यहासे जाता हूँ” । शृगाल बोला-“भो अधीर ! निडर होकर तू भक्षण कर । उसका आगमन दूरसेभी मैं तुझसे कहदूगा” । ऐसा करने पर शार्दूलसे खाल फाडी हुई जानकर शृगालने कहा-“भो भानूजे ! जाओ यह सिंह आरहाहै” । यह सुन चित्रक दूर भाग गया । सो जबतक यह उस भेदन किये द्वारसे मास खाने लगा तबतक अतिक्रोध किये दूसरा शृगाल आया तब उसने अपनी तुल्य पराक्रममें उसे जानकर यह श्लोक पढा-
उत्तमं प्रणिपातेन शूरं भेदेन योजयेत् ।
नीचमल्पप्रदानेन समशक्तिं पराक्रमैः ॥ ७९ ॥
उत्तमको प्रणाम कर, शूरको भेद करके, नीचको कुछ देकर और समान शक्तिको पराक्रमसे युक्त करे ॥ ७९ ॥