पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)
Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary
पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ( ४५० ) | पञ्चतन्त्रम् । |
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व्याघ्रान् प्रति प्रकुपितोऽस्मि” । तत् श्रुत्वा व्याघ्रः सन्त्रस्तः तमाह,–“भो भागिनेय ! देहि मे प्राणदक्षिणाम् । त्वया तस्य अत्र चिराय आयातस्यापि मदीया कापि वार्त्ता न आख्येया” । एवमभिधाय सत्वरं पलायाञ्चक्रे । अथ गते व्याघ्रे तत्र कश्चित् द्वीपी समायातः । तमपि दृष्ट्वा असौ व्यचिन्तयत्,–“दृढदंष्ट्रोऽयं चित्रकः, तदस्य पार्श्वदस्य गजस्य यथा चर्मच्छेदो भवति तथा करोमि” । एवं निश्चित्य तमपि उवाच,–“भो भगिनीसुत ! किमिति चिरात् दृष्टोऽसि ? कथञ्च बुभुक्षित इव लक्ष्यसे ? तत् अतिथिरसि मे । एष गजः सिंहेन हतः तिष्ठति । अहं च अस्य तदादिष्टो रक्षपालः । परं तथापि यावत् सिंहो न समायाति, तावत् अस्य गजस्य मांसं भक्षयित्वा तृप्तिं कृत्वा द्रुततरं व्रज” । स आह,–“माम ! यदि एवं तन्न कार्यं मे मांसाशनेन, यतो जीवन्नरो भद्रशतानि पश्यति । उक्तञ्च–
ऐसा विचार कर उसके सामने होकर गर्वसे ऊंचे कन्धे कर संभ्रमसे बोला,–“मामा ! आप कैसे यहां मृत्युमुखमें प्रविष्ट हुए हो ? जिस सिंहने इस हाथीको मारा है वह मुझे इसकी रक्षामें नियुक्त कर स्नान करनेको नदीके किनारे गया है । उसने जाते हुए मुझसे कहा–“जो कोई मेरे पीछे व्याघ्र आये तो तू मुझे गुस्सासे कह देना । क्यों कि यह वन मैं व्याघ्ररहित करदूंगा । कारण पहले एक व्याघ्रने मेरा मारा हुआ हाथी एकान्तमें भक्षण कर उच्छिष्ट करदिया । उसदिनसे मैं व्याघ्रोंपर क्रोधित हुआ हूं” । यह सुन व्याघ्र उससे घबडाकर बोला,–“भो भानजे ! मुझे प्राणदक्षिणा दे तुझे यहां उसके देरमें आनेपर भी मेरी कोई बात न कहनी” । ऐसा कह शीघ्र पलायन करगया । तब व्याघ्रके जानेमें कोई शार्दूल वहां आया । उसे देखकर यह विचारने लगा,–“यह शार्दूल दृढ दाढोंवाला है । सो इसके निकटसे जैसे हाथीका चर्मछेद हो वैसा करूं । ऐसा विचार कर उससे बोला,–“भो भानजे! क्या कारण है बहुत दिनोंमें तुझको देखा । क्या भूखेकी समान दीखता है ? । सो मेरा अतिथि है । यह हाथी सिंहसे मरा पडा है । मैं उसकी आज्ञासे इसकी