भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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भाषाटीकासमेतम् । ( ४३७ )

जो मनमें है वह जिह्वा ( वचन )'में नहीं, जो जिह्वामें वह बाहर नहीं, जो हित है उसके करनेकी इच्छा नहीं करतीं, स्त्रियें अद्भुत चरित्रवाली हैं ॥ ५६ ॥

के नाम न विनश्यन्ति मिथ्याज्ञानान्नितम्बिनीम् ।
रम्यां य उपसर्पन्ति दीपाभां शलभा यथा ॥ ५७ ॥

अज्ञानसे मनोहर नितम्बवाली स्त्रीके निकट जाकर कौन नष्ट नहीं होते हैं दीपकी ज्योतिको प्राप्त होकर पतंग जैसे नहीं बचते ॥ ५७ ॥

अन्तर्विषमया ह्येता बहिश्चैव मनोरमाः ।
गुञ्जाफलसमाकाराः स्वभावादेव योषितः ॥ ५८ ॥

यह स्त्री भीतर विषरूप बाहरसे मनोहर हैं स्वभावसेही स्त्री चौंटलीके फलके आकारवाली हैं ॥ ५८ ॥

ताडिता अपि दण्डेन शस्त्रैरपि विखण्डिताः ।
न वशं योषितो यान्ति न दानैर्न च संस्तवैः ॥ ५९ ॥

दण्डसे ताडित और शस्त्रसे विखण्डित होकर तथा दान और स्तुतिसेभी स्त्री वशीभूत नहीं होती हैं ॥ ५९ ॥

आस्तां तावत्किमन्येन दौरात्म्येनेह योषिताम् ।
विधृतं स्वोदरेणापि घ्नन्ति पुत्रं स्वकं रुषा ॥ ६० ॥

स्त्रियोंकी और दुरात्मता इस संसारमे रहो अर्थात् अधिक क्या कहें यह क्रोधसे अपने उदरमें स्थित पुत्रकोभी मार देती हैं ॥ ६० ॥

रूक्षायां स्नेहसद्भावं कठोरायां सुमार्दवम् ।
नीरसायां रसं बालो बालिकायां विकल्पयेत् ॥ ६१ ॥”

मूर्ख ( पुरुष ) रूखीमें प्रेम सद्भाव, कठोरमें मृदुता, नीरसमे रस इन बालाओंमें कल्पना करता है ॥ ६१ ॥

मकर आह,—“भो मित्र ! अस्तु एतत्, परं किं करोमि, मम अनर्थद्वयमेतत् सञ्जातम् । एकस्तावत् गृहभंगः, अपरस्त्वद्विधेन मित्रेण सह चित्तविश्लेषः, अथवा भवति एवं दैवयोगात्, उक्तञ्च यतः—

मकरने कहा,—“भो मित्र ! है तो ऐसाही परन्तु मैं क्या करू मुझको यह दो अनर्थ हुए । एक तो घरका नाश दूसरे तुम्हारी समान मित्रका वियोग । अथवा दैव योगसे ऐसा होता ही है । कहा है—