भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

पृष्ठ 450, कुल 536 में से

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भाषाटीकासमेतम् । (४३५)

नस्थानमपि नीयते । अथ अन्यस्मिन् अहनि स मदोद्धतो दूरात् रासभीशब्दमशृणोत् । ततश्रवणमात्रेण एव स्वयं शब्दयितुमारब्धः । अथ ते क्षेत्रपाला रासभोऽयं व्याघ्रचर्म-प्रतिच्छन्न इति ज्ञात्वा लगुडशरपाषाणप्रहारैः तं व्यापादित-वन्तः । अतोऽहं ब्रवीमि-

किसी एक स्थानमें शुद्धपट नाम धोबी रहता था । उसका एक गधा था वह घासके बिना अतिदुर्बलताको प्राप्त हुआ । तब उस धोबीने वनमें घूमते हुए एक मरा व्याघ्र देखा विचाराभी, “ अहो ! बहुत अच्छा हुआ । इस व्याघ्र (चीते) के चमड़ेसे ढककर रात्रिमें गधेको जौके क्षेत्रमें छोड़ दूंगा । जिससे इसको व्याघ्र मानकर समीपवर्ती क्षेत्रपाल इसको न निकालेंगे” । ऐसा करनेपर गधा यथेच्छ धान्य खेत भक्षण करने लगा सवेरे धोबी उसे अपने स्थानमें लाता। इस प्रकार समय बीतनेपर गधा पुष्ट शरीर होगया । कठिनतासे बंधन स्थानमें ले जाया जाता । तब और दिन उस मदोद्धतने दूरसे गधैयाका शब्द सुना उसके सुनतेही वह स्वयं शब्द करने लगा । तब वे क्षेत्रपाल यह तो गधा है व्याघ्रचर्मसे ढका है ऐसा जानकर लठिया बाण तथा पत्थरके प्रहारोंसे उसे मारते हुए । इससे मैं कहता हूं-

सुगुप्तं रक्ष्यमाणोऽपि दर्शयन्दारुणं वपुः ।
व्याघ्रचर्मप्रतिच्छन्नो वाक्कृते रासभो हतः ॥ ५२ ॥ ”

अच्छी प्रकार रक्षा होकर भी अपना दारुण शरीर दिखाता हुआ व्याघ्रचर्मसे प्रच्छन्न हुआ गधा वाणीके दोषसे मारा गया ॥ ५२ ॥”

अथ एवं तेन सह वदतो मकरस्य जलचरेण एकेन आगत्य अभिहितं-“भो मकर ! त्वदीया भार्या अनशनो-पविष्टा त्वयि चिरयति प्रणयाभिभवाद्दिपन्ना” । एवं तद्वज्र-पातसदृशवचनमाकर्ण्य अतीव व्याकुलितहृदयः प्रलपितमेवं चकार । “अहो ! किमिदं संजातं मे मन्दभाग्यस्य । उक्तञ्च-

तब ऐसे उसके साथ कहते मकरके एक जलचरने आकर उससे कहा-“भो मकर ! तुम्हारी स्त्री अनशन व्रतमें बैठी हुई तुम्हारे चिरकालतक न आनेसे प्रेमकी अवमाननाके कारण मर गई” । इस प्रकार उसके वज्रघातकी समान

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