पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)
Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary
पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम् । (४३३)
प्रसन्ना आसीत् । अथ नन्दस्य भार्यापि तथा एव रुष्टा प्रसाद्यमानापि न तुष्यति । तेन उक्तं,—“भद्रे ! त्वया विना मुहूर्त्तमपि न जीवामि, पादयोः पतित्वा त्वां प्रसादयामि”। सा अब्रवीत्—“यदि खलीनं मुखे प्रक्षिप्य अहं तव पृष्ठे समारुह्य त्वां धावयामि । धावितस्तु यदि अश्ववत हेषेसे, तदा प्रसन्ना भवामि” । राज्ञापि तथा एव अनुष्ठितम् । अथ प्रभातसमये सभायां उपविष्टस्य राज्ञः समीपे वररुचिः आयातः । तञ्च दृष्ट्वा राजा पप्रच्छ,—“भो वररुचे ! किं पर्व्वणि मुण्डितं शिरस्त्वया ?” सोऽब्रवीत्—
विख्यात बल पुरुषार्थवाला अनेक राजाओंके मुकुटोंके किरणजालसे सेवित चरणपीठवाला, शरत्कालके चन्द्रमाकी समान निर्मल यशवाला, सागर पर्य्यन्त पृथ्वीका स्वामी, नन्द नाम राजा था । उसके सम्पूर्ण शास्त्रके तत्व जाननेवाला वररुचि नाम मन्त्री था । उसकी स्त्री प्रेमके कलहमें क्रोधित हुई । वह बहुत प्यारी थी इस कारण अनेक प्रकार सन्तुष्ट करने परभी प्रसन्न न हुई । उसका भर्त्ता बोला—“भद्रे ! तुम किस कारणसे प्रसन्न होती हो ? सो कहो । अवश्य उसको मैं करू” तब किसी प्रकार उसने कहा—“यदि शिर मुँडाकर मेरे चरणोंमें गिरो तो मैं प्रसन्न होजाऊगी” । वैसा करनेपर वह प्रसन्न हुई । तब नन्दकी भार्याभी उसी प्रकार रूठकर किसी प्रकार सन्तुष्ट नहीं होती । उसने कहा—“भद्रे ! तेरे विना मैं मुहूर्त्त मात्रभी नहीं जी सकता । चरणमें पडकर तुझे प्रसन्न करता हूं” । वह बोली—“यदि मुखमें लगाम डालो और मैं तुम्हारे ऊपर चढ कर शीघ्रतासे तुम्हे चलाऊ । और दौडते हुए तुम घोड़ेकी समान शब्द करो तो मैं प्रसन्नहूँ” । राजानेभी वैसा किया । तब प्रातःकाल सभामें बैठे राजाके समीप वररुचि आया उसे देखकर राजाने पूछा—“अहो वररुचि ! किस पर्वमें तुमने शिर मुँडाया ?” वह बोला—
न किं दद्यान्न किं कुर्य्यात्स्त्रीभिरभ्यर्थितो नरः ।
अनश्वा यत्र हेषन्ते शिरः पर्व्वणि मुण्डितम् ॥ ४९ ॥
स्त्रीसे प्रार्थित हुआ मनुष्य क्या नहीं देता और क्या नहीं करता जहा घोड़े न होकरभी मनुष्य हींसते हैं उसी पर्व्वमेंभी शिर मुंडित हुआ है ॥ ४९ ॥
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