पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)
Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary
पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४४८ ) पञ्चतन्त्रम् ।
प्राह,—"भोः ! न अहमन्येन हतं सत्त्वं कदाचिदपि भक्ष- यामि । उक्तञ्च—
किसी वनमें महा चतुरक नाम शृगाल रहताथा । उसको एक समय वनमें स्वयं मृतक हुआ हाथी मिला । उसके चारों ओर घूमा परन्तु उसकी कठिन त्वचा भंग करनेको समर्थ न हुआ । इसी समय इधर उधर विचारण करता कोई सिंह वहां आया, तब सिंहको आया हुआ देखकर यह पृथ्वीमें अपना शिर धरकर दोनों हाथ जोडकर विनयपूर्वक बोला,—"स्वामिन् ! मैं आपकी लकडी धारणकरनेवाला स्थित हूं आपहीके निमित्त इस हाथीकी रक्षा करता हूं । सो स्वामी इसको भक्षण करे" । उस प्रणाम करते हुएको देखकर सिंह बोला,—"भो ! मैं दूसरेके मारे हुए जीवको कभी भक्षण नहीं करता हूं । कहा है कि—
वनेऽपि सिंहा मृगमांसभक्ष्या बुभुक्षिता नैव तृणं चरन्ति । एवं कुलीना व्यसनाभिभूता न नीतिमार्गं परिलङ्घयन्ति ॥ ७५ ॥
वनमें भी सिंह मृगके मांसका भक्षण करते हैं भूखे होकरभी तृण नहीं खाते हैं, इसी प्रकार कुलके मनुष्य व्यसनसे तिरस्कृत होकर भी नीतिमार्गको उल्लंघन नहीं करते हैं ॥ ७५ ॥
तत् तव एव गजोऽयं मया प्रसादीकृतः" तत् श्रुत्वा शृगालः सानन्दमाह,—"युक्तमिदं स्वामिनो निजभृत्येषु । उक्तञ्च यतः—
सो यह हाथी तुमको मैंने प्रसन्नतारूपसे दिया है" । यह सुनकर शृगाल आनंदित होकर बोला,—"स्वामीको अपने भृत्योंमें यह बात उचितही है । जिससे कि कहा है—
अन्त्यावस्थोऽपि महान्स्वामिगुणान्न जहाति शुद्धतया । न श्वेतभावमुञ्झति शंखः शिखिभुक्तिमुक्तोऽपि ॥ ७६ ॥
अन्त्य अवस्थाको प्राप्त हुआ भी महान् पुरुष शुद्धतासे स्वामीके गुणोंको नहीं त्यागता है जैसे शुद्ध करनेको अग्निमें भस्मकर निकाला हुआ शंख अपनी श्वेतताको नहीं त्यागता है ॥ ७६ ॥
अथ सिंहे गते कश्चिद् व्याघ्रः समाययौ, तमपि दृष्ट्वा असौ व्यचिन्तयत् । "अहो ! एकस्तावत् दुरात्मा प्रणिपातेन