भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

पृष्ठ 470, कुल 536 में से

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अथ अपरीक्षितकारकं पंचमं तन्त्रम्।

अथ इदमारभ्यतेऽपरीक्षितकारकं नाम पञ्चमं तन्त्रं यस्य अयम् आदिमः श्लोकः-

अब यह ( १ ) अपरीक्षितकारकनाम पांचवा तंत्र आरंभ किया जाता है जिसके आदिमें यह श्लोक है-

कुदृष्टं कुपरिज्ञातं कुश्रुतं कुपरीक्षितम्। तन्नरेण न कर्त्तव्यं नापितेनात्र यत्कृतम् ॥ १ ॥

जो कुदृष्ट हो, कुत्सित जाना गयाहो, बुरी प्रकार सुनाहो, जो बुरी प्रकार परीक्षा किया हो वह मनुष्यको नहीं करना चाहिये जैसा कि इस संसारमें नाईने किया ॥ १ ॥

तद्यथा अनुश्रूयते- सो ऐसा सुना है-

कथा १.

अस्ति दाक्षिणात्ये जनपदे पाटलिपुत्रं नाम नगरम्। तत्र मणिभद्रो नाम श्रेष्ठी प्रतिवसति स्म। तस्य च धर्मार्थकाममोक्षकर्मणि कुर्व्वतो विधिवशात् धनक्षयः सञ्जातः। ततो विभवक्षयात् अपमानपरम्परया परं विषादं गतः। रात्रौ सुप्तः चिन्तितवान्,-"अहो! धिक् इमां दरिद्रताम्। उक्तञ्च-

दक्षिणके देशमें पाटलिपुत्रनाम एक नगर है। वहां मणिभद्रनाम एक सेठ रहताथा, उसके धर्म, अर्थ, काम, मोक्षको सेवन करते प्रारब्ध वशसे धन क्षय होगया। तब धनके क्षय होनेके कारण अपमानकी परम्परासे परम विषादको प्राप्त हुआ, रातमें सोता हुआ विचारने लगा,-"अहो ! इस दरिद्रताको धिकार है। कहा है कि-

शीलं शौचं क्षान्तिर्दाक्षिण्यं मधुरता कुले जन्म। न विराजन्ति हि सर्वे वित्तविहीनस्य पुरुषस्य ॥ २ ॥


१ बे समझे करना ।

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