भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

पृष्ठ 471, कुल 536 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 471

( ४५६ ) पञ्चतन्त्रम् ।

शील, पवित्रता, सहनशीलता, चतुराई, मधुरता, कुलमें जन्म, वित्तहीन पुरुषके कुछ भी भले नहीं लगते ॥ २ ॥

मानो वा दर्पो वा विज्ञानं विभ्रमः सुबुद्धिर्वा । सर्वं प्रणश्यति समं वित्तविहीनो यदा पुरुषः ॥ ३ ॥

जब पुरुष धनहीन होता है तब मान, दर्प, विज्ञान, विलास, बुद्धि, एक साथही सब नष्ट होजाते हैं ॥ ३ ॥

प्रतिदिवसं याति लयं वसन्तवाताहतेव शिशिरश्रीः । बुद्धिर्बुद्धिमतामपि कुटुम्बभरचिन्तया सततम् ॥ ४ ॥

वसन्तकी वातसे हत हुई शिशिर ऋतुकी शोभाकी समान बुद्धिमानोंकी बुद्धि निरन्तर कुटुम्बके भरण पोषणकी चिन्तामेंही लय होजाती है ॥ ४ ॥

नश्यति विपुलमतेरपि बुद्धिः पुरुषस्य मन्दविभवस्य । घृतलवणतैलतण्डुलवस्त्रेन्धनचिन्तया सततम् ॥ ५ ॥

मन्द ऐश्वर्य होजानेपर महाबुद्धिमान्‌की बुद्धि भी नष्ट होजाती है, निरन्तर घृत, लवण, तेल, तण्डुल, वस्त्र, ईंधनकी चिन्ताही लगी रहती है ॥ ५ ॥

गगनमिव नष्टतारं शुष्कं सरः श्मशानमिव रौद्रम् । प्रियदर्शनमपि रूक्षं भवति गृहं धनविहीनस्य ॥ ६ ॥

नष्ट तारेवाले आकाशकी समान, सूखे सरोवरकी समान भयंकर श्मशानकी समान धनहीनका घर प्रियदर्शन भी उपरोक्त प्रकारका लगता है ॥ ६ ॥

न विभाव्यन्ते लघवॊ वित्तविहीनाः पुरोऽपि निवसन्तः । सततं जातविनष्टाः पयसामिव बुद्बुदाः पयसि ॥ ७ ॥

धनसे हीन लघुपुरुष आगे निवास करते हुए भी विदित नहीं होते जैसे जलसे उत्पन्न होकर जलमें ही नष्ट होकर ( बुलबुले ) नहीं विदित होते हैं॥७॥

सुकुलं कुशलं सुजनं विहाय कुलकुशलशीलविकलेऽपि । आढ्ये कल्पतराविव नित्यं रज्यन्ति जननिवहाः ॥ ८ ॥

जन समूह अच्छे कुलीन चतुर सुजन ( निर्धनी पुरुषको छोड़कर ) कुल चतुरता और शीलसे हीन भी धनी पुरुषमें कल्पवृक्षकी समान नित्य अनुराग करते हैं ॥ ८ ॥