पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)
Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary
पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
पृष्ठ 480, कुल 536 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम् । ( ४६५ )
प्रकाश करनेके निमित्त माताके सम्मुख गया । माताभी रुधिरसे गीला उसका मुख देखकर शंकितचित्तसे “कि, इस दुरात्माने मेरा बालक खाया है” ऐसा विचार कर क्रोधसे उसके ऊपर वह जलका घडा फेंका । इस प्रकार वह नौले-को मारकर जबतक विलाप करती घरमें आई तबतक बालक सो रहा था । निकटही काले सर्पको टुकडे हुआ देखकर पुत्रवधके शोकसे अपना शिर वृक्षकी जडमें मारने लगी । इसी समय ब्राह्मण भिक्षा लेकर आय देखने लगा कि, पुत्रशोकसे ब्राह्मणी विलाप कर रही है । “भो ! भो ! लोभी ! लोभके कारण तैने मेरा वचन न किया । सो अब पुत्रकी मृत्युके दुःखरूपी वृक्षका फल भोग । अथवा अच्छा कहा है-
अतिलोभो न कर्त्तव्यो लोभं नैव परित्यजेत् ।
अतिलोभाभिभूतस्य चक्रं भ्रमति मस्तके ॥ २२ ॥”
अति लोभ नहीं करना चाहिये और सर्वथा लोभ त्यागना भी न करे, अति लोभी मनुष्यके मस्तकपर चक्र घूमता है ॥ २२ ॥”
ब्राह्मण आह,—“कथमेतत् ?” सा प्राह,—
ब्राह्मण बोला—“यह कैसे ?” वह बोली--
कथा ३.
कस्मिंश्चित् अधिष्ठाने चत्वारो ब्राह्मणपुत्राः परस्परं मित्र-तां गता वसन्ति स्म, ते चापि दारिद्र्योपहताः परस्परं मन्त्रं चक्रुः “अहो ! धिक् इयं दारिद्रता । उक्तञ्च-
किसी स्थानमें चार ब्राह्मणके पुत्र परस्पर मित्र रहते थे वे दारिद्रताको प्राप्त हो परस्पर विचार करने लगे । “अहो ! इस दारिद्रताको धिक्कार है । कहा है-
वरं वनं व्याघ्रगजादिसेवितं
जनेन हीनं बहुकण्टकावृतम् ।
तृणानि शय्या परिधानवल्कलं
न बन्धुमध्ये धनहीनजीवितम् ॥ २३ ॥
सिंह हाथियोंसे सेवित मनुष्योंसे हीन बहुत काटोंसे युक्त वन बहुत अच्छा है, तृणकी शय्या और वल्कल वस्त्र उत्तम है, परन्तु बंधुओंके बीचमें धनहीन होकर जीना भला नहीं ॥ २३ ॥
३०