पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)
Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary
पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४६६ ) पञ्चतन्त्रम् ।
तथाच-
और देखो-
स्वामी द्वेष्टि सुसेवितोऽपि सहसा प्रोज्झन्ति सद्बान्धवा
राजन्ते न गुणास्त्यजन्ति तनुजाः स्फारीभवन्त्यापदः ।
भार्या साधु सुवंशजापि भजते नो यान्ति मित्राणि च
न्यायारोपितविक्रमाण्यपि नृणां येषां न हि स्याद्धनम् २४॥
जिन मनुष्योंके पास धन नहीं है अच्छी प्रकार सेवन करनेसे प्रभु उनका आदर नहीं करता है, सद्बान्धव उसको त्याग देते हैं, गुण उसके शोभित नहीं होते हैं, पुत्रत्याग देते हैं, आपत्ति विस्तारको प्राप्त होती हैं, सत्कुलमे उत्पन्न हुई भार्या भी उनको नहीं भजती है, नीतिमार्गसे पुरुषकारसे प्राप्त हुए मित्र भी उनके पास नहीं आते हैं ॥ २४ ॥
शूरः सुरूपः सुभगश्च वाग्मी
शस्त्राणि शास्त्राणि विदांकरोति ।
अर्थं विना नैव यशश्च मानं
प्राप्नोति मर्त्योऽत्र मनुष्यलोके ॥ २५ ॥
शूर, स्वरूपवान्, सुन्दर, वाचाल, शस्त्र तथा शास्त्रका जाननेवाला मनुष्य अर्थके बिना इस लोकमें यश तथा मानको प्राप्त नहीं होता है ॥ २५ ॥
तानीन्द्रियाण्यविकलानि तदेव नाम
सा बुद्धिरप्रतिहता वचनं तदेव ।
अर्थोष्मणा विरहितः पुरुषः स एव
बाह्यः क्षणेन भवतीति विचित्रमेतत् ॥ २६ ॥
वही अविकल इन्द्री, वही नाम है, वही अप्रतिहत बुद्धि और वही वचन है, किन्तु वही पुरुष धनकी गरमीसे रहित हुआ क्षणमात्रमें सबसे पृथक् होता है यह विचित्र है ॥ २६ ॥
तद्गच्छामः कुत्रचित् अर्थाय,” इति संमन्त्र्य स्वदेशपुरं च स्वसुहृत्सहितं बान्धवयुतं गृहं च परित्यज्य प्रस्थिताः, अथवा साधु इदमुच्यते-
सो कहीं धनप्राप्तिके निमित्त जांयगे”। ऐसा विचारकर अपने देश पुरको तथा सुहृद बांधवोके सहित घरको छोड़कर चले। अथवा यह अच्छा कहाहे-