भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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पृष्ठ 483

( ४६८ ) पञ्चतन्त्रम् ।

कभी जल आकाशसे पुष्करिणी आदिमें पतित होता है, कभी पातालसे निकलता है, दैव अचिन्त्य और बलवान् है पुरुषकारमें यह बात नहीं (विफल) है ॥२९॥

अभिमतसिद्धिरशेषा भवति हि पुरुषस्य पुरुषकारेण । दैवमिति यदपि कथयसि पुरुषगुणः सोऽप्यदृष्टाख्यः॥३०॥

पुरुषकारसे पुरुषको सम्पूर्ण मनोरथ सिद्धि मिलती है और जो दैवको कहता है वहभी पुरुषका अदृष्ट नामक गुण है ॥ ३० ॥

भयमतुलं गुरुलोकात्तृणमिव तुलयन्ति साधु साहसिकाः । प्राणानद्भुतमेतच्चरितं चरितं ह्युदाराणाम् ॥ ३१ ॥

साहसी पुरुष गुरुजनोंसे अतुल भय तथा प्राणोंको तृणकी समान मानते हैं महान् पुरुषोंका यह अद्भुत चरित्र है ॥ ३१ ॥

क्लेशस्याङ्गमदत्त्वा सुखमेव सुखानि नेह लभ्यन्ते । मधुभिन्मथनायस्तैराश्लिष्यति बाहुभिर्लक्ष्मीम् ॥ ३२ ॥

इस संसारमें शरीरको बिना क्लेश दिये सुखकी प्राप्ति नहीं होती है मधुसूद- नने समुद्रमथनसे श्रान्तहुए भुजाओं द्वाराही लक्ष्मीकी प्राप्ति की थी ॥ ३२ ॥

तस्य कथं न चला स्यात्पत्नी विष्णोर्नृसिंहकस्यापि । मासांश्चतुरो निद्रां यः सेवति जलगतः सततम् ॥ ३३ ॥

नृसिंहरूपधारी उन विष्णुकी लक्ष्मी क्यों चलायमान नहो जो जलमें स्थित हो चार महीने निरन्तर निद्रा सेवन करते हैं ॥ ३३ ॥

दुरधिगमः परभागो यावत्पुरुषेण साहसं न कृतम् । जयति तुलामधिरूढो भास्वानिह जलदपटलानि ॥३४॥

जबतक पुरुष साहस नहीं करता तबतक पराया भाग दुर्लभ है तुला ( राशि ) को प्राप्त होकरही सूर्य मेघसमूहोंको जीतता है ॥ ३४ ॥

तत्कथ्यताम् अस्माकं कश्चित् धनोपायो विवरप्रवेशशा- किनीसाधनश्मशानसेवनमहामांसविक्रयसाधकवर्त्तिप्रभृती- नामेकतमं इति । अद्भुतशक्तिर्भगवान् श्रूयते । वयमपि अति- साहसिकाः। उक्तञ्च-

सो कोई हमको धनप्राप्तिका उपाय कहो, पातालगमन, शाकिनीसाधन, श्मशानसेवन, महामांसविक्रय, साधकवर्ति आदिमें कोई एक ( विधि बताओ ) आप अद्भुत शक्तिवाले सुने जाते हो । हमभी बडे साहसी हैं । कहा है-