भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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भाषाटीकासमेतम् । ( ४७५ )

सो यहभी चले”। ऐसा करनेपर उन बटोहियोंने जगलमें मरे सिंहकी हड्डी -देखी । तब एकने कहा-“अहो ! आज विद्याकी परीक्षा करे । कोई यह जीव मृतक हुआ स्थित है । सो विद्याके प्रभावसे इसको जीवित करें । मैं अस्थिसंचय करू”। तब एकने उत्कण्ठासे अस्थिसंचय की । दूसरेनें ( मन्त्रसे ) चर्म मास रुधिरसे युक्त किया । तीसराभी जबतक उसको जीवित करने लगा । तबतक सुबुद्धिने निषेध किया-‘भो ! आप ठहरो । यह सिंह निर्मित किया जाता है । जो इसे जीवित करोगे तो यह सबको नष्टकर देगा”। इस प्रकार उसके कहनेपर वह बोला,-‘धिक् मूर्ख ! मैं विद्याको विफल नहीं करूंगा”। तब उसने कहा-“तो क्षणमात्र प्रतीक्षा करो जबतक मैं वृक्षपर चढ जाऊ”। ऐसा करनेपर जभी उन्होंने उसे जिवाया तबतक उन तीनोंको उठकर सिंहने मारडाला । और वह फिर वृक्षसे उतरकर घर गया । इससे मैं कहता हू-

वरं बुद्धिर्न सा विद्या विद्याया बुद्धिरुत्तमा ।
बुद्धिहीना विनश्यन्ति यथा ते सिंहकारकाः ॥ ३९ ॥

बुद्धि अच्छी है विद्या नहीं विद्यासे बुद्धि श्रेष्ठ है बुद्धिहीन पुरुष सिंह बनानेवालोकी समान नष्ट होते हैं ॥ ३९ ॥

अतः परमुक्तञ्च-
औरभी कहा है-

अपि शास्त्रेषु कुशला लोकाचारविवर्जिताः ।
सर्वे ते हास्यतां यांति यथा ते मूर्खपण्डिताः ॥ ४० ॥”

शास्त्रमें भी कुशल लोकाचारसे हीन सब वे मूर्खपंडितोकी समान हास्यताको प्राप्त होते हैं ॥ ४० ॥”

चक्रधर आह-“कथमेतत् ?” सोऽब्रवीत्-
चक्रधर बोला-“यह कैसे ?” वह बोला-

कथा ५.

कस्मिंश्चित् अधिष्ठाने चत्वारो ब्राह्मणाः परस्परं मित्रत्वम् आपन्ना वसन्ति स्म । बालभावे तेषां मतिः अजायत । “भो ! देशान्तरं गत्वा विद्याया उपार्जनं क्रियते” । अथ अन्यस्मिन् दिवसे ब्राह्मणाः परस्परं निश्चयं कृत्वा विद्योपा

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