भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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पृष्ठ 493

( ४७८ ) पञ्चतन्त्रम् ।

ऐसे कह उस पत्रके ऊपर गिरे जबतक नदी उसे ( पंडितको ) बहा लेचली तबतक उसे बहता हुआ देख दूसरे पंडितने बाल पकडकर कहा--

“सर्वनाशे समुत्पन्ने अर्द्धं त्यजति पण्डितः ।
अर्द्धेन कुरुते कार्य्यं सर्वनाशो हि दुःसहः ॥ ४२ ॥”

सर्वनाश उपस्थित होनेमें पंडित जन आधा त्यागदेते हैं आधेसेही कार्य करते हैं कारण कि सर्वनाश नहीं सहा जाता है ॥ ४२ ॥

इत्युक्त्वा तस्य शिरश्छेदो विहितः । अथ तैश्च पश्चात् गत्वा कश्चिद्ग्राम आसादितः । तेऽपि ग्रामीणैः निमन्त्रिताः पृथक् पृथक् गृहेषु नीताः । ततः एकस्य सूत्रिका घृतखण्डसंयुक्ता भोजने दत्ता । ततो विचिन्त्य पण्डितेन उक्तम्—“यद्दीर्घसूत्री विनश्यति”—एवमुक्त्वा भोजनं परित्यज्य गतः। तथा द्वितीयस्य मण्डका दत्ताः । तेनापि उक्तञ्च—“अतिविस्तारविस्तीर्णं तद्भवेन्न चिरायुषम्” । स च भोजनं त्यक्त्वा गतः । अथ तृतीयस्य वटिकाभोजनं दत्तम् । तत्रापि पण्डितेन उक्तम्—“छिद्रेष्वनर्था बहुलीभवन्ति”। एवं तेऽपि त्रयः पण्डिताः क्षुत्क्षामकण्ठा लोकैः हास्यमानाः ततः स्थानात् स्वदेशं गताः। अथ सुवर्णसिद्धिः आह—“यत्त्वं लोकव्यवहारम् अजानन् मया वार्य्यमाणोऽपि न स्थितः ततः ईदृशीमवस्थाम् उपगतः । अतोऽहं ब्रवीमि—

ऐसा कह उसका शिर काट लिया । तब वह पीछे फिर कर किसी ग्राममें पहुंचे । उन्हे ग्रामीण निमंत्रित कर पृथक् पृथक् अपने घर लेगये तब एकने सूत्रघृत खांडसे युक्त भोजनको दिया । तब विचार कर पंडितने कहा—“जो कि दीर्घसूत्री ( आलसी ) नष्ट होता है” । ऐसा कह भोजन त्याग कर गया । दूसरेने मण्ड ( मिष्टान्न ) दिया तब उसने कहा “अतिविस्तारसे विस्तीर्ण चिरायुके निमित्त नहीं होता है” । और वह भी भोजन त्याग कर चलागया । तीसरेने वटिका ( पिट्टी ) का भोजन दिया । वहां भी उस पंडितेने कहा—“छिद्र युक्त ( पिष्टक ) में बहुत अनर्थ होते हैं” । इस प्रकार वे तीनो पंडित भूखसे व्याकुल लोकोंसे हंसीको प्राप्त हुए अपने देशोंको प्राप्त हुए । तब सुवर्णसिद्धि बोला—“जो कि तू लोकव्यवहारको न जानकर मुझसे निवारण किया हुआ भी न स्थित हुआ इस कारण ऐसी दशाको प्राप्त हुआ । इससे मैं कहता हूं—