पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)
Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary
पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम्। ( ४८१ )
सर्पाणाञ्च खलानाञ्च सर्वेषां दुष्टचेतसाम् । अभिप्राया न सिद्ध्यन्ति तेनेदं वर्तते जगत् ॥ ४७ ॥
सर्प, खल, और सब प्रकारके दुष्टचित्तवाले पुरुषोंके अभिप्राय सिद्ध नहीं होते हैं इसीसे यह जगत् वर्तता है ॥ ४७ ॥
तत् तावत् तेषाम् आगमनमपि न सम्पत्स्यते, भविष्यति वा, तर्हि त्वां बुद्धिप्रभावेण आत्मसहितं रक्ष्यिष्यामि यतोऽनेकां सलिलगतिचर्याम् अहं जानामि”। तत् आकर्ण्य शतबुद्धिः आह,-“भो ! युक्तमुक्तं भवता, सहस्रबुद्धिरेव भवान् । अथवा साधु इदमुच्यते-
सो पहले तो उनके आगमनकीभी सम्भावना नहीं। और होगा तो तुझे बुद्धिके प्रभावसे अपने सहित रक्षा करूंगा । कारण अनेक जलकी गतियोंमें चलना मैं जानता हूं” यह सुनकर शतबुद्धि बोला,-“भो ! तुमने सत्य कहा । आप सहस्र बुद्धिही हो । अथवा यह अच्छा कहा है--
बुद्धेर्बुद्धिमतां लोके नास्त्यगम्यं हि किंचन । बुद्ध्या यतो हता नन्दाश्चाणक्येनासिपाणयः ॥ ४८ ॥
बुद्धिमानोंकी बुद्धिके सम्मुख संसारमें कोई वस्तु अगम्य नहीं होती बुद्धिसेही चाणक्यने खड्गपाणि नन्दोंका वध किया ॥ ४८ ॥
तथाच-
और देखो--
न यत्रास्ति गतिर्वायो रश्मीनाञ्च विवस्वतः । तत्रापि प्रविशत्याशु बुद्धिर्बुद्धिमतां सदा ॥ ४९ ॥
जहाँ वायु और सूर्यकी किरणोंकी गति नहीं है वहाँभी बुद्धिमानोंकी बुद्धि सदा प्रवेश कर जाती है ॥ ४९ ॥
ततो वचनश्रवणमात्रादपि पितृपर्यायागतं जन्मस्थानं त्यक्तुं न शक्यते । उक्तंच-
सो वचनश्रवणमात्रसेही पिता आदिके क्रमसे प्राप्त हुई जन्मभूमि त्यागनेको समर्थ नहीं होता । कहा है कि-
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