भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

पृष्ठ 496, कुल 536 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 496

भाषाटीकासमेतम्। ( ४८१ )

सर्पाणाञ्च खलानाञ्च सर्वेषां दुष्टचेतसाम् । अभिप्राया न सिद्ध्यन्ति तेनेदं वर्तते जगत् ॥ ४७ ॥

सर्प, खल, और सब प्रकारके दुष्टचित्तवाले पुरुषोंके अभिप्राय सिद्ध नहीं होते हैं इसीसे यह जगत् वर्तता है ॥ ४७ ॥

तत् तावत् तेषाम् आगमनमपि न सम्पत्स्यते, भविष्यति वा, तर्हि त्वां बुद्धिप्रभावेण आत्मसहितं रक्ष्यिष्यामि यतोऽनेकां सलिलगतिचर्याम् अहं जानामि”। तत् आकर्ण्य शतबुद्धिः आह,-“भो ! युक्तमुक्तं भवता, सहस्रबुद्धिरेव भवान् । अथवा साधु इदमुच्यते-

सो पहले तो उनके आगमनकीभी सम्भावना नहीं। और होगा तो तुझे बुद्धिके प्रभावसे अपने सहित रक्षा करूंगा । कारण अनेक जलकी गतियोंमें चलना मैं जानता हूं” यह सुनकर शतबुद्धि बोला,-“भो ! तुमने सत्य कहा । आप सहस्र बुद्धिही हो । अथवा यह अच्छा कहा है--

बुद्धेर्बुद्धिमतां लोके नास्त्यगम्यं हि किंचन । बुद्ध्या यतो हता नन्दाश्चाणक्येनासिपाणयः ॥ ४८ ॥

बुद्धिमानोंकी बुद्धिके सम्मुख संसारमें कोई वस्तु अगम्य नहीं होती बुद्धिसेही चाणक्यने खड्गपाणि नन्दोंका वध किया ॥ ४८ ॥

तथाच-
और देखो--

न यत्रास्ति गतिर्वायो रश्मीनाञ्च विवस्वतः । तत्रापि प्रविशत्याशु बुद्धिर्बुद्धिमतां सदा ॥ ४९ ॥

जहाँ वायु और सूर्यकी किरणोंकी गति नहीं है वहाँभी बुद्धिमानोंकी बुद्धि सदा प्रवेश कर जाती है ॥ ४९ ॥

ततो वचनश्रवणमात्रादपि पितृपर्यायागतं जन्मस्थानं त्यक्तुं न शक्यते । उक्तंच-

सो वचनश्रवणमात्रसेही पिता आदिके क्रमसे प्राप्त हुई जन्मभूमि त्यागनेको समर्थ नहीं होता । कहा है कि-

३१