भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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पृष्ठ 499

( ४९४ ) पञ्चतन्त्रम् ।

"भो भगिनीसुत ! पश्य पश्य, अतीव निर्मला रजनी । तदहं गीतं करिष्यामि । तत् कथय कतमेन रागेण करोमि ?" स आह,-"माम! किमनेन वृथा अनर्थप्रचालनेन यतः चौरकर्म-प्रवृत्तौ आवां निभृतैश्च चौरजारैः अत्र स्थातव्यम् । उक्तञ्च-

किसी स्थानमें उद्धत नाम गधा रहता था । वह सदा धोबीके घरमें बोझ उठाकर रात्रिको स्वेच्छासे पर्यटन करता । और प्रातःकालही बन्धनके भयसे स्वयं ही धोबीके घर आजाता । रजक भी उसको बन्धनमें न नियुक्त करता । तब उसके रात्रिमें घूमतेहुए क्षेत्रोंमें शृगालके साथ एक समय उसकी मित्रता होगई । वह पुष्ट होनेसे बाड़ तोड़कर ककड़ीके खेतमें शृगालसहित घुस जाता । इस प्रकार वे यथेच्छ ककड़ी भक्षण करते प्रतिदिन प्रातःकाल अपने स्थानको जाते । तब कभी उस मदोद्धत गधेने क्षेत्रके मध्यस्थित हो शृगालसे कहा-"भो भानूजे ! देख २ बड़ी निर्मल रात्रि है । सो मैं गीत करता हूं । सो कह कौनसे राग ( स्वर ) से गाऊं ?" वह बोला,-"मामा ! इन अनर्थके व्यापारसे क्या है ? क्यों कि चोरकर्ममें प्रवृत्त हुए हम दोनो हैं । इस ससारमें चोर जारोंको मौन रहना चाहिये । कहा है-

कासयुक्तस्त्यजेच्चौर्यं निद्रालुश्चैत्स चौरिकाम् ।
जिह्वालौल्यं रुजाक्रान्तो जीवितं योऽत्र वाञ्छति ॥५३॥

खांसीवाला चोरी न करे, बहुत सोनेवाला चोरीकी वृत्तिको त्यागन करे, रोगी जिह्वाका स्वाद त्यागदे, जो जीवनकी इच्छा करे तो ॥ ५३ ॥

अपरं त्वदीयं गीतं न मधुरस्वरं शंखशब्दानुकारं दूरादपि श्रूयते । तदत्र क्षेत्रे रक्षापुरुषाः सन्ति । ते उत्थाय वधं बन्धं वा करिष्यन्ति । तद्भक्षय तावत् अमृतमयाः चिर्भटीः । मा त्वम् अत्र गीतव्यापारपरो भव" । तत् श्रुत्वा रासभ आह,-"भो ! वनाश्रयत्वात् त्वं गीतरसं न वेत्सि । तेन एतदब्रवीषि । उक्तञ्च-

फिर तेरा गीतभी मधुर स्वरका नहीं है शंखके शब्दकी समान दूरसे भी सुना जाता है । और इस खेतमें रक्षा पुरुष हैं । वे उठकर वध वा बंधन करेंगे सो अमृतमय ककडी खाओ । इस समय तुम गीतका व्यापार मतकरो" । यह सुनकर गधा बोला,-"भो ! वनवासी होनेसे तू गीतरसको नहीं जानता है इससे ऐसा कहता है । कहा है-