पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)
Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary
पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५०० ) पञ्चतन्त्रम् ।
“भो यूथप ! भवान् इयन्तं कालं कुत्र स्थितः ? भवता ईदृक् रत्नमाला कुत्र लब्धा ? या दीप्त्या सूर्य्यमपि तिरस्करोति”। वानरः प्राह,-“अस्ति कुत्रचित् अरण्ये गुप्ततरं महत्सरो धनदनिर्मितम्, तत्र सूर्य्येऽर्द्धोदिते रविवारे यः कश्चित् निमज्जति स धनदप्रसादात् ईदृक् रत्नमालाविभूषितकण्ठो निःसरति”। अथ भूभुजा तदाकर्ण्य स वानरः समाहूतः पृष्टश्च-“भो यूथाधिप ! किं सत्यमेतत् ? रत्नमालासनाथं सरोऽस्ति क्वापि ?” कपिराह,-“स्वामिन् ! एष प्रत्यक्षतया मत्कण्ठस्थितया रत्नमालया प्रत्ययस्ते । तद् यदि रत्नमालया प्रयोजनं तन्मया सह कमपि प्रेषय येन दर्शयामि”। तत् श्रुत्वा नृपतिः आह-“यदि एवं तदहं सपरिजनः स्वयम् एष्यामि येन प्रभूता रत्नमालाः सम्पद्यन्ते”। वानर आह-“एवं क्रियताम्” । तथा अनुष्ठिते भूपतिना सह रत्नमालालोभेन सर्वे कलत्रभृत्याः प्रस्थिताः । वानरोऽपि राज्ञा दोलाधिरूढेन स्वोत्सङ्गे आरोपितः सुखेन प्रीतिपूर्वकम् आनीयते । अथवा साधु इदमुच्यते-
तब उस वृद्ध वानरने क्षुधा पिपासासे व्याकुल हो वनमें घूमते हुए कमलिनी खण्डसे मंडित एक सरोवर प्राप्त किया । जबतक सूक्ष्म दृष्टिसे उसे देखता है कि तबतक वनचर मनुष्योंकी पदपंक्तिसे प्रवेश तो देखा परन्तु निकलना न पाया । तब उसने विचार किया । “निश्चयही इस जलके भीतर दुष्ट ग्राह होगा । सो कमलके पत्तेसे जल ग्रहणकर दूरसे पिऊं”। ऐसा करते ही उसमेंसे राक्षस निकलकर रत्नमालासे भूषित कण्ठ उससे बोला,-“भो ! जो इस जलमें प्रवेश करता है वह मेरा भक्ष्य होता है सो तुमसे अधिक धूर्त दूसरा नहीं होगा जो पानी इस प्रकारसे पीता है । सो मैं तुझसे सन्तुष्ट हू । अपना मनोवांछित मांग ले” वानर बोला,-“भो ! तुममें भक्षणकी शक्ति कितनी है?” वह बोला,-“सो दशसहस्र लक्षभा जलमें प्रवेश हुए खा सक्ता हू। और बाहरसे तौ शृगालभी मुझको पराभव कर सकता है”। वानर बोला,-“मेरा एक राजाके संग बडा बैर है जो इस रत्नमालाको मुझे दे तो सपरिवार उस राजाकूं वाणीके प्रपञ्चसे लोभितकर इस सरोवरमें प्रविष्ट करूं”। घटमी श्रद्धा करने योग्य उसके वचनको