पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)
Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary
पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम् । (१०७);
"यादृशी वदनच्छाया दृश्यते तव वानर । विकालेन गृहीतोऽसि यः परेति स जीवति ॥ ९० ॥
"हे वानर ! जैसी तेरे मुखकी छाया दीखती है विकालसे गृहीत हुआ तूभी विदित होता है, जो भागेगा सो जियेगा ॥ ९० ॥"
उक्त्वा प्रनष्टश्च । यह कह भागगया-
तत्प्रेषय मां येन गृहं गच्छामि । त्वं पुनः अनुभुङ्क्ष्व अत्र स्थित एव लोभवृक्षफलम्" । चक्रधरः प्राह,-"भोः ! अकारणमेतत्, दैववशात् सम्पद्यते नृणां शुभाशुभम् । उक्तञ्च-
सो मुझे जानेकी आज्ञा दो । और तू यहीं स्थित हुआ लोभवृक्षका फल भोग " । चक्रधर बोला,-"भो ! यह अकारण हुआ है । दैववशसे मनुष्योंको शुभाशुभ फलकी प्राप्ति होती है । कहा है-
दुर्गस्त्रिकूटः परिखा समुद्रो रक्षांसि योधा धनदाच्च वित्तम् । शास्त्रञ्च यस्योशनसा प्रणीतं स रावणो दैववशाद्विपन्नः ॥ ९१ ॥
जिसका दुर्ग त्रिकूट पर्वत, समुद्र खाई, राक्षस योध, कुबेरसे धनकी प्राप्ति, जिसके यहा शुक्रका निर्मित किया शास्त्र वह रावण भी दैववशसे नष्ट हुआ ॥ ९१ ॥
तथाच- और देखो-
अन्धकः कुब्जकश्चैव त्रिस्तनी राजकन्या । त्रयोऽप्यन्यायतः सिद्धाः सम्मुखे कर्मणि स्थिते ॥९२॥"
तथा अंधा कुबडा तीन स्तनवाली राजकन्या यह तीनों कर्मके सन्मुख होनेमें अन्यायसे भी सिद्ध हुए ॥ ९२ ॥"
सुवर्णसिद्धिः आह-"कथमेतत् ?" सोऽब्रवीत्- सुवर्णसिद्धि बोला,-"यह कैसे ?" वह बोला-