पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)
Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary
पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
पृष्ठ 523, कुल 536 में से
संदर्भ में पढ़ें| ( ५०८ ) | पञ्चतन्त्रम् । |
|---|
कथा १२.
अस्ति उत्तरापथे मधुपुरं नाम नगरम् । तत्र मधुसेनो नाम राजा बभूव । तस्य कदाचित् विषयसुखम् अनुभवतः त्रिस्तनी कन्या बभूव । अथ तां त्रिस्तनीं जातां श्रुत्वा स राजा कञ्चुकिनः प्रोवाच,—"यद भोः त्यज्यतामियं त्रिस्तनी गत्वा दूरेऽरण्ये यथा कश्चित् न जानाति" । तच्छ्रुत्वा कञ्चुकिनः प्रोचुः,—"महाराज ! ज्ञायते यत अनिष्टकारिणी त्रिस्तनी कन्या भवति । तथापि ब्राह्मणा आहूय प्रष्टव्या येन लोकद्वयं न विरुद्धयते । यतः—
उत्तर दिशामें एक मधुपुर नाम नगर है । वहां मधुसेन नामवाला राजाथा । उसको कभी विषयसुख अनुभव करते तीन स्तनवाली कन्या हुई । उसको तीन स्तनवाली हुई सुनकर राजा कंचुकीसे बोला,—"भो ! इस तीन स्तनीको दूर वनमें जाकर त्याग दा जो कोई भी इसको न जाने" । यह सुन कंचुकी बोले,—"महाराज ! यह जाना तो है कि, तीन स्तनी कन्या अनिष्टकारिणी होती है । तो भी ब्राह्मणोंको बुलाकर बूझाजाय, जिससे दोनों लोक न बिगडें । क्योंकि—
यः सततं परिपृच्छति शृणोति सन्धायत्यनिशम् । तस्य दिवाकरकिरणैर्नलिनीव विवर्द्धते बुद्धिः ॥ ९३ ॥
जो सदा पूछता, सुनता, रातदिन धारण करता है उसकी बुद्धि सूर्यकी किरणोंसे कमलिनीकी समान बढती है ॥ ९३ ॥
तथाच— और देखो—
पृच्छकेन सदा भाव्यं पुरुषेण विजानता । राक्षसेन्द्रगृहीतोऽपि प्रश्नान्मुक्तो द्विजः पुरा ॥ ९४ ॥"
विज्ञ पुरुषकोभी प्रश्न करना चाहिये, राक्षसेन्द्रसे गृहीत हुआ कोई पुरुष पहले प्रश्नसेही मुक्त हुआ था ॥ ९४ ॥"
राजा आह—"कथमेतत् ?" ते प्रोचुः— राजा बोला,—"यह कैसे ?" वे बोले—