पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)
Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary
पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५१४ ) पञ्चतन्त्रम् ।
किञ्चित् शस्त्रं पश्यति तावत् कोपव्याकुलमनाः पूर्व्ववत् शयनं गत्वा कुब्जं चरणाभ्यां संगृह्य सामर्थ्यात् स्वमस्तकोपरि भ्रामयित्वा त्रिस्तनीं हृदये व्यताडयत् । अथ कुब्जप्रहारेण तस्याः तृतीयः स्तन उरसि प्रविष्टः । तथा बलात् मस्तकोपरिभ्रामणेन कुब्जः प्राञ्जलतां गतः । अतोऽहं ब्रवीमि-
तब और दिन त्रिस्तनीने मन्थरकसे कहा,-“भो सुभग ! यदि यह अन्ध किसी प्रकारसे मारा जाय तो हम दोनोंका समय सुखसे बीते, सो कहीं विषकी खोज करो जो इसे देकर मैं सुखी हूं”। तब एक दिन कुबड़ेने घूमते हुए काल मराहुआ सांप पाया, उसको ग्रहण कर प्रसन्न हुआ घरमें आकर उससे बोला-“भो सुभगे ! यह काल सांप लम्बा है, सो इसे टुकड़े कर अनेक सोंठआदि मसालोंसे संस्कृत कर इस विकलनेत्रके निमित्त मच्छीका मांस बताकर प्रदान करूं । इससे झटही यह नष्ट हो जायगा । कारण कि इसको मत्स्यका मांस सदा प्रिय है”। ऐसा कह मन्थरक बाहर गया । वह भी दीप्त अग्निमें काले सर्पके टुकड़े कर मठ्ठामें डाल घरके व्यापारमें व्याकुल हुई उस विकलाक्षसे नम्रतापूर्वक बोली,-“आर्य्यपुत्र ! यह तुम्हारा अभीष्ट मत्स्यमांस प्राप्त किया है । जिसको तुम सदाही पूछा करते हो वे मत्स्य अग्निमें पकानेको स्थित हैं सो जबतक मैं घरका कार्य करूं, तबतक तुम करछुलो लेकर एक क्षणमात्रको उन्हें चलाओ”। वह भी यह बचन सुन प्रसन्न मनसे जिह्वासे होठ चाटता हुआ शीघ्र उठ करछुलीसे चलाने लगा । तब उसको मत्स्य मठ्ठेमें विष गर्भसे उठा धुआं नेत्रोंके नील पटलको लगता हुआ । तब यह अन्धा उसे बहुत उपकारक मान विशेषकर नेत्रोंसे ( १ ) बाष्प ग्रहण करता भया । तब दृष्टिके प्राप्त होनेसे जब देखने लगा, तब मठ्ठेके बीचमें केवल काले सांपके टुकड़ेही देखे । तब विचारने लगा,-“अहो यह क्या है ? इसने तो मुझे मत्स्यका मांस बतलाया था और यह तो काले सांपके खण्ड हैं । सो इस त्रिस्तनीकी चेष्टाको भली प्रकारसे जानूं ? क्या यह मेरे वधका उपाय है या कुब्जकके वा किसी अन्यका?” ऐसा विचार कर अपने आकारको छिपाये हुए अन्धकी समान कर्म करने लगा जैसे कि पहिले । इसी समय कुब्जक आकर निश्शंकतासे आलिंगन चुम्बनादिसे त्रिस्तनीको सेवने लगा । वह भी अन्धा उसको देखकर जब कोई शस्त्र
१ भाफ ।