पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)
Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary
पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम्। (५१५)
न पाता हुआ तबतक पूर्ववत् शयन स्थानमें जाकर कुबड़ेकी टांगे पकड सामर्थ्यसे अपने मस्तकपर घुमांकर त्रिस्तनीके हृदयमें प्रहार करता हुआ । तब कुब्जके प्रहारसे उसका तीसरा स्तन हृदयमें प्रवेश कर गया और बलसे मस्तकके ऊपर घुमानेसे कुबड़ा सीधा होगया । इससे मैं कहता हू-
अन्धकः कुब्जकश्चैव राजकन्या च त्रिस्तनी । त्रयोऽप्यन्यायतः सिद्धाः सन्मुखे कर्मणि स्थिते ॥१०१॥”
अन्धा, कुबड़ा और तीन स्तनवाली राजकन्या यह तीनों सन्मुख कर्मकी स्थितिमें अन्यायसे सिद्ध हुए ॥ १०० ॥”
सुवर्णसिद्धिः आह,-“भोः सत्यमेतत्, दैवानुकूलतया सर्वं कल्याणं सम्पद्यते । तथापि पुरुषेण सतां वचनं कार्य्यम् । न पुनः एवमेव वर्त्तते स त्वमिव विनश्यति ।
सुवर्णसिद्धि बोला,-“भो ! यह सत्य हे, देवानुकूलतासे सब कार्यमें मगल होगा तो भी पुरुषको सत्पुरुषोके वचन करने चाहिये, न कि ऐसाही है यह कहनेसे वह पुरुष तुम्हारी समान नष्ट होगा ।
तथाच- और देखो-
एकोदराः पृथग्ग्रीवा अन्योऽन्यफलभक्षिणः । असंहता विनश्यन्ति भारण्डा इव पक्षिणः ॥ १०१ ॥”
एक उदर, पृथक् ग्रीवावाले परस्पर फलके भक्षण कर्ता मेल नकरनेसे भारण्ड पक्षीकी समान नष्ट होते हैं ॥ १०१ ॥”
चक्रधर आह,-“कथमेतत् ?” सोऽब्रवीत । चक्र धर बोला,-“यह कैसे ?” वह बोला-
कथा १४.
कस्मिंश्चित् सरोवरे भारण्डनामा पक्षी एकोदरः पृथग्ग्रीवः प्रतिवसति स्म । तेन च समुद्रतीरे परिश्रमता किञ्चित् फलम् अमृतकल्पं तरङ्गाक्षिप्तं सम्प्राप्तम् । सोऽपि भक्षयन् इदमाह,-“अहो! बहूनि मया अमृतप्रायाणि समुद्रकल्लोलाहतानि फलानि भक्षितानि । परमपूर्वोऽस्य आस्वादः, तत