भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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( ५१६ ) पञ्चतन्त्रम् ।

किं पारिजातहरिचन्दनतरुसम्भवं किं वा किञ्चित् अमृतमयफलम् अव्यक्तेनापि विधिना पतितम्”। एवं तस्य ब्रुवतो द्वितीयमुखेन अभिहितम्,-“भो ! यदि एवं तत् ममापि स्तोकं प्रयच्छ येन जिह्वासौख्यम् अनुभवामि”। ततो विहस्य प्रथमवक्रेण अभिहितम्,-“आवयोः तावदेकं उदरं एका तृप्तिश्च भवति । ततः किं पृथग्भक्षितेन, वरमनेन शेषेण प्रिया तोष्यते”। एवं अभिधाय तेन शेषं भारण्ड्याः प्रदत्तं सापि तत् अस्वाद्य प्रहृष्टतमा आलिङ्गनचुम्बनसम्भावनानेकचाटुपरा बभूव । द्वितीयं मुखं तद्दिनादेव प्रभृति सोद्वेगं सविषादञ्च तिष्ठति । अथ अन्येद्युः द्वितीयमुखेन विषफलं प्राप्तम् । तद् दृष्ट्वा अपरमाह,-“भो! नित्रिंश पुरुषाधम निरपेक्ष ! मया विषफलम् आसादितम्। तत् तवापमानात् भक्षयामि”। अपरेण अभिहितम्,-“मूर्ख ! मा मा एवं कुरु, एवं कृते द्वयोरपि विनाशो भविष्यति”। अथ एवं वदता तेन अपमानेन फलं भक्षितं किं बहुना, द्वौ अपि विनष्टौ । अतोऽहं ब्रवीमि,-

किसी सरोवरमें भारण्ड नामवाला पक्षी एक उदर और दो शिरवाला रहता था । उसने सागरके किनारे घूमते हुए कोई फल अमृतकी समान तरङ्गोंसे फेंका हुआ प्राप्त किया वह भी उसे भक्षण करता यह बोला,-“अहो ! बहुतसे मैंने अमृतकी समान सागरकी लहरसे क्षिप्त हुए फल खाये हैं परन्तु इसका स्वाद अपूर्व है । सो क्या पारिजात हरिचन्दनके वृक्षसे उत्पन्न हुआ है ? क्या कोई अमृतमय फल ? वा मेरी अच्छी विधिसे प्राप्त हुआ है”। इस प्रकार उसके कहनेसे उसके दूसरे मुखने कहा,-“भो ! यदि ऐसा है तो मुझे भी थोडासा दो जिससे जिह्वाका सुख अनुभव करूंगा”। तब हँसकर प्रथम मुखने कहा-“हम दोनोंका एकही उदर है एकही तृप्ति होती है। सो पृथक् भक्षण करनेसे क्या है इस शेषसे प्रियाको सन्तुष्ट करेंगे”। ऐसा कहकर उसने शेष भारण्डीको दिया । वहभी उसको खाकर प्रसन्न मनसे आलिंगन चुम्बनकी सम्भावनासे अनेक चाटु बचन कहती हुई । दूसरा मुख उसी दिन लेकर उद्वेग और विषाद युक्त रहने लगा। तब ओर दिन दूसरे मुखने एक विष फल पाया । उसको देखकर