भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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भाषाटीकासमेतम् । ( ३९ )

विश्वासके विना तो देवताभी शत्रुको सिद्ध नहीं कर सकते, विश्वाससेही इन्द्रने दितिका गर्भनाश¹ कर दिया ॥ १२६ ॥”

एवं सम्प्रधार्य स्थानान्तरं गत्वा दमनकमार्गमवलोकयन् एकाकी तस्थौ । दमनकोऽपि सञ्जीवकसकाशं गत्वा वृषभोऽयमिति परिज्ञाय हृष्टमना व्यचिन्तयत् । “अहो ! शोभनमापतितम् अनेन एतस्य सन्धिविग्रहद्वारेण मम पिंगलको वश्यो भविष्यति इति । उक्तञ्च–

ऐसा विचारकर अन्यस्थानमें जाय दमनककी बाट देखता हुआ इकल्ला स्थित रहा । दमनक भी सजीवकके निकट जाकर यह बैल है ऐसा जानकर प्रसन्न हो विचारने लगा “आहा ! यह तो अच्छी बात हुई । इसके साथ उसकी संधि विग्रह होनेसे पिंगलक मेरे वशीभूत हो जायगा । कहा भी है–

न कौलीन्यान्न सौहार्द्दान्नृपो वाक्ये प्रवर्त्तते ।
मन्त्रिणां यावदभ्येति व्यसनं शोकमेव च ॥ १२७ ॥

कुलीनता और सुहृदतासे राजा मन्त्रियोंके वाक्यमें प्रवृत्त नहीं होता है जबतक कि, उसको व्यसन और शोककी प्राप्ति नहीं होती ॥ १२७ ॥

सदैवापद्गतो राजा भोग्यो भवति मन्त्रिणाम् ।
अत एव हि वाञ्छन्ति मन्त्रिणः सापदं नृपम् ॥ १२८ ॥

आपत्तिमें प्राप्त हुआ राजा मन्त्रियोंको सदा भोग्य होता है, इसकारण मन्त्री राजाको आपत्तियुक्त रहनेकी ही इच्छा करते हैं ॥ १२८ ॥

यथा नेच्छति नीरोगः कदाचित्सुचिकित्सकम् ।
तथापद्रहितो राजा सचिवं नाभिवाञ्छति ॥ १२९ ॥”

जैसे निरोगी कभी वैद्यकी इच्छा नहीं करता, इसी प्रकार आपत्तीरहित राजा कभी मन्त्रीकी इच्छा नहीं करता ॥ १२९ ॥”

एवं विचिन्तयन् पिंगलकाभिमुखः प्रतस्थे । पिंगलकोऽपि तमायान्तं प्रेक्ष्य स्वाकारं रक्षन् यथापूर्वमवस्थितः । दमनकोऽपि पिंगलकसकाशं गत्वा प्रणम्य उपविष्टः । पिंगलक आह–“किं दृष्टं भवता तत् सत्त्वम्”? । दमनक आह–“दृष्टं


१ देखो भागवतपर हमारी टीका ।

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