भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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(४०) पञ्चतन्त्रम् ।

स्वामिप्रसादात्'' । पिंगलक आह-''अपि सत्यम्'' ? । दमनक आह-''किं स्वामिपादानामग्रेऽसत्यं विज्ञाप्यते? । उक्तञ्च-

ऐसा विचारकर पिंगलकके समीप चला, पिंगलकभी उसको आता देख अपना आकार रक्षित किये हुए पहलेकी समान स्थित भया । दमनकभी पिंगलकके धोरे जाकर प्रणामकर स्थित हुआ । पिंगलक बोला-“क्या आपने उस जीवको देखा?” दमनक बोला-“स्वामीकी कृपासे देखा” । पिंगलक बोला-“क्या सत्य है?” । दमनक बोला-“क्या स्वामीके चरणोंके सन्मुख असत्य कहाजाता है ? । कहा भी है कि-

अपि स्वल्पमसत्यं यः पुरो वदति भूभुजाम् ।
देवानाञ्च विनश्येत स द्रुतं सुमहानपि ॥ १३० ॥

जो देवता और राजाके आगे थोडाभी असत्य कहताहै वह महान् भी शीघ्रनष्ट होजाताहै ॥ १३० ॥

तथाच-
और देखो-

सर्वदेवमयो राजा मनुना सम्प्रकीर्त्तितः ।
तस्मात्तं देववत्पश्येन्न व्यलीकेन कर्हिचित् ॥ १३१ ॥

मनुजीने कहा है कि, राजामे सब देवता निवास करतेहैं । इसकारण उसको सदा देवताओंके समान देखना कभी और प्रकारसे नही॥१३१॥

सर्वदेवमयस्यापि विशेषो नृपतेरयम् ।
शुभाशुभफलं सद्यो नृपाद्देवाद्भवन्तरे ॥ १३२ ॥''

सर्वदेवमय होनेवाले राजामें यह विशेष है कि, राजासे शुभाशुभ फल शीघ्र मिलताहै और देवताओंसे जन्मान्तरमें फल मिलताहै ॥ १३२ ॥''

पिङ्गलक आह-“सत्यं दृष्टं भविष्यति भवता । न दीनोपरि महान्तः कुप्यन्ति इति न त्वं तेन निपातितः । यतः-

पिंगलक बोला-“आपने सत्यही देखा होगा, परन्तु दीनोंके ऊपर महान् क्रोध नहीं करते इस कारण उसने तुझको नहीं मारा । क्योंकि,-

तृणानि नोन्मूलयति प्रभञ्जनो
मृदूनि नीचैः प्रणतानि सर्वतः ।