पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)
Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary
पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम् । ( ४१ )
स्वभाव एवोन्नतचेतसामयं महान्महत्स्वेव करोति विक्रमम् ॥ १३३ ॥
पवन मृदु नीचे सब प्रकार प्रणत हुए तृणोंको उन्मूलन नहीं करताहै श्रेष्ठ चित्तवालोंका यह स्वभावही है बडे पुरुष बडोंमेंही विक्रम करतेहैं ॥ १३३ ॥
अपिच-
औरभी-
गण्डस्थलेषु मदवारिषु बद्धराग-
मत्तभ्रमद्भ्रमरपादतलाहतोऽपि ।
कोपं न गच्छति नितान्तबलोऽपि नाग-
स्तुल्ये बले तु बलवान्परिकोपमेति ॥ १३४ ॥ ”
मदके जलवाले गण्डस्थलोंमे प्रीति करनेवाले मतवाले भ्रमण करते हुए भोरोंके चरणतलसे ताडित होकर भी महाबली हाथी उनपर क्रोध नहीं करता कारण कि, बलवान् तुल्यबलमे क्रोध करताहै ॥ १३४ ॥”
दमनक आह-“अस्तु एवंस महात्मा वयं कृपणाः तथापि स्वामी यदि कथयति ततो भृत्यत्वे नियोजयामि ।” पिङ्गलक आह-“( सोच्छ्वासम् ) किं भवान् शक्नोत्येवं कर्तुम्?”। दमनक आह-“किमसाध्यं बुद्धेरस्ति । उक्तञ्च-
दमनक बोला-“यही हो क्योंकि, वह महात्मा और हम दीन हैं तोभी यदि आप कहें तो आपके भृत्यपनमें उसको नियुक्त करूं” । पिंगलक ( विश्वास लैकर ) बोला-“क्या तुम यह कर सकते हो”? । दमनक बोला-“बुद्धिके सामने क्या असाध्य है, कहा है-
न तच्छस्त्रैर्न नागेन्द्रैर्न हयैर्न पदातिभिः ।
कार्य्यं संसिद्धिमभ्येति यथा बुद्ध्या प्रसाधितम् ॥ १३५॥ ”
कार्य जैसा बुद्धिसे सिद्ध होताहै ऐसा शस्त्र, हाथी, घोडे, पैदलोंसे सिद्ध नहीं होता, ॥ १३५ ॥”
पिङ्गलक आह-“यदि एवं, तर्हि अमात्यपदे अध्यारोपितस्त्वम् । अद्यप्रभृति प्रसादनिग्रहादिकं त्वयैव कार्य्यमिति निश्चयः।” । अथ दमनकः सत्वरं गत्वा साक्षेपं तमिदमाह-