भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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भाषाटीकासमेतम् । (४५)

अथ सञ्जीवकसकाशमासाद्य सप्रश्रयमुवाच-“भो मित्र ! प्रार्थितोऽसौ मया भवदर्थे स्वाम्यभयप्रदानम् । तद्विश्रब्ध मागम्यतामिति । परं त्वया राजप्रसादमासाद्य मया सह समयधर्मेण वर्त्तितव्यम् । न गर्वमासाद्य स्वप्रभूतया विचरणीयम् । अहमपि तव संकेतेन सर्व्वां राज्यधुरममात्यपदवीमाश्रित्य उद्धरिष्यामि। एवं कृते द्वयोरपि आवयोः राज्यलक्ष्मीर्भोग्या भविष्यति । यतः-

सञ्जीवकके निकट जाकर नम्रतापूर्वक यह वचन बोला-“हे मित्र ! आपके निमित्त मैंने स्वामीसे अभयदानके लिये प्रार्थना की । सो नि शक होकर चलो परन्तु तुमको राजाका प्रसाद प्राप्त कर, मेरे साथ नियमक्रमसे बर्तना चाहिये, गर्वको प्राप्त होकर अपनी प्रभुतासे न विचरना और मैंभी तुम्हारे संकेतसे सम्पूर्ण राज्यभार अमात्यपदवीको प्राप्त कर धारण करूंगा ऐसा करनेसेही हम दोनोंको राज्यलक्ष्मी भोग्य होगी । कारण-

आखेटकस्य धर्मेण विभवाः स्युर्वशे नृणाम् ।
नृप्रजाः प्रेरयत्येको हन्त्यन्योऽत्र मृगानिव ॥ १४० ॥

आखटके धर्मसे ऐश्वर्य मनुष्योंके वशीभूत होजाते हैं, एक मनुष्यरूपी प्रजाओंको प्रेषण करता हैऔर दूसरा इस संसारमें मृगोंकी समान कार्यसिद्धि करता है ॥ १४० ॥

तथाच-
और देखो-

यो न पूजयते गर्वादुत्तमाधममध्यमान् ।
भूपसम्मानमान्योऽपि भ्रश्यते दन्तिलो यथा ॥ १४१ ॥”

जो गर्वसे उत्तम, अधम, मध्यमका सन्मान नहीं करता है, वह राजासे सन्मान मान्यताको प्राप्त होकरभी दन्तिलके समान भ्रष्ट होता है ॥ १४१ ॥”

सञ्जीवक आह-“कथमेतत् ?” सोऽब्रवीत-
सञ्जीवक बोला-“यह कैसी कथा है ?” वह बोला-