पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)
Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary
पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
पृष्ठ 62, कुल 536 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम्। (४७)
, इस प्रकार समयके बीतनेपर एक समय दन्तिलका विवाह हुआ। वहा उसने सब नगरके रहनेवाले तथा राजसमीपी लोक बहुत सन्मानसे निमन्त्रण कर बुलाय भोजन कराय वस्त्रादिसे सत्कार किये। तब विवाहके उपरान्त रनवाससहित राजाकोभी अपने घरमे बुलाकर सत्कार किया। उस राजाके घरकी बुहारी देनेवाले गोरम्भ नाम राजसेवकको घर आनेपरभी अनुचित स्थानमे बैठनेके कारण गलहस्त देकर निकाल दिया। वहभी उस दिनसे लेकर निश्वास लेता हुआ अपमानके कारण रात्रिकोभी नहीं सोता था। 'किस प्रकारमै इस भाडप-तिकी राजप्रसाद हानि करू' यही विचार करता रहता । 'अथवा वृथा इस शरीरके शुष्ककरनेसे क्याहै। मैं कुछभी उसका अपकार नहीं करसकता। अथवा किसीने सत्य कहाहै-
यो ह्यपकर्त्तुमशक्तः कुप्यति किमसौ नरोऽत्र निर्लज्जः ।
उत्पतितोऽपि हि चणकः शक्तः किं भ्राष्ट्रकं भङ्क्तुम् ॥ १४३॥
जो किसीका कुछ अपकार नहीं कर सकता वह निर्लज्ज वृथा क्यों क्रोध करताहै, कूदकरभी क्या चना भाडको फोड सकताहै ॥ १४३ ॥
अथ कदाचित्प्रत्यूषे योगनिद्रां गतस्य राज्ञः शय्यान्ते मा-र्जनं कुर्वन् इदमाह-"अहो ! दन्तिलस्य महद्दृप्तत्वं यत् राज-महिषीमालिङ्गति"तच्छ्रुत्वा राजा ससम्भ्रममुत्थाय तमुवाच-"भो ! भो ! गोरम्भ ! सत्यमेतत् यत् त्वया जल्पितं किं देवी दन्तिलेन समालिंगाता ? इति" । गोरम्भः प्राह-"देव ! रा-त्रिजागरणेन द्यूतासक्तस्य मे बलात् निद्रा समायाता । तत न वेद्मि किं मया अभिहितम्" । राजा-(सेर्ष्यं स्वगतम्) "एष तावदस्मद्गृहे अप्रतिहतगतिः तथा दन्तिलोऽपि । तत्कदाचित् अनेन देवी समालिंग्यमाना दृष्टा भविष्यति । तेन इदमाभिहितम् । उक्तञ्च-
एकसमय प्रातःकाल जब कि, राजा उघानींदमें था उनकी सेजके निकट बुहारी देता हुआ यों बोला-"आश्चर्यहै दन्तिलका ऐसा घमण्डहै कि, राजम-हिषीको आलिंगन करताहै"। यह सुन राजा घबडाता हुआ उठकर उससे बोला-"भोभो गोरम्भ ! यह सत्य है क्या जो तैने कहा, क्या देवीको दन्तिलने