पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)
Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary
पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम् । ( ५६ )
संजीवक बोला—"यह ऐसाही है जैसा तुमने कहाहै वही मैं करूंगा।" यह कहनेपर दमनक उसको ले पिंगलकके समीप गया और बोला—"देव ! यह मैं सञ्जीवकको लायाहू, अब स्वामीही प्रमाण है"। सञ्जीवकभी उसको सादर प्रणाम कर विनयपूर्वक आगे बैठगया और पिंगलकभी उसके पुष्ट और बडे कंधेपर नखरूपी वज्रसे अलंकृत दहिना हाथ ऊपर रख आदरसे बोला—"आप कुशलहैं ? इस निर्जनवनमे कहासे आये २ " उसनेभी अपना वृत्तान्त कहा जैसे वर्द्धमानके सगवियोग हुआ वहभी सब कहा। यह सुन पिंगलक आदरपूर्वक उससे बोला—"मित्र मेरे भुजपञ्जरसे रक्षित होकर कहीं मत डरो, अब तुम यथेच्छ ( स्वच्छन्द ) रहो और नित्य हमारे समीपमें आओ जिस कारणसे कि, बहुतसे दुःखवाले भयकर जीवोसे सेवित यह वन बडे २ प्राणियोको भी असेव्यहै, फिर घास खानेवालोको तो क्या"। यह कह सब मृगोके सहित यमुनाके किनारेपर आय जलपान कर स्वेच्छासे उस वनमें प्रविष्ट हुआ। तब करटक दमनकपर राज्यभार सौंप सञ्जीवकके साथ सुभाषित गोष्ठीका सुख अनुभव करता रहने लगा।
अथवा साध्विदमुच्यते—
अथवा यह सत्य कहा है—
यदृच्छयाप्युपनतं सकृत्सज्जनसङ्गतम् ।
भवत्यजरमत्यन्तं नाभ्यासक्रममीक्षते ॥ १६२ ॥
अकस्मात् महान् उपस्थित हुआ सज्जनका सग अक्षय फलवाला होता है, वह बारबार अभ्यासके क्रमकी अपेक्षा नहीं करता है (एकही बारमें बहुत उपकार होता है) ॥ १६२ ॥
सञ्जीवकेनापि अनेकशास्त्रावगाहनात् उत्पन्नबुद्धिप्रागल्भ्येन स्तोकैरेवाहोभिर्मूढमतिः पिंगलको धीमान् तथा कृतो यथारण्यधर्माद्वियोज्य ग्राम्यधर्मेषु नियोजितः । किं बहुना प्रत्यहं पिंगलकसञ्जीवकावेव केवलं रहसि मन्त्रयतः । शेषः सर्वोपि मृगजनो दूरीभूतस्तिष्ठति । करटकदमनकावपि प्रवेशं न लभेते । अन्यच्च सिंहपराक्रमाभावात्सर्वोऽपि मृगजनस्तौ च शृगालौ क्षुधाव्याधिबाधिता एकां दिशमाश्रित्य स्थिताः । उक्तञ्च-