भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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( ५६ ) पञ्चतन्त्रम् ।

सञ्जीवकके साथ अनेक शास्त्रके अवगाहनसे बुद्धिकी प्रगल्भता अधिक होनेके कारण थोड़ेही दिनोंमें उसने मूढमति पिंगलक इस प्रकार बुद्धिमान् कर दिया कि, वनके धर्मोंसे पृथक् कर ग्राम्य धर्ममें लगादिया । बहुत कहनेसे क्या प्रतिदिन संजीवक और पिंगलकही केवल एकान्तमें सम्मति करते, शेष सम्पूर्ण मृगजन दूरस्थित रहते, करटक दमनकको भी प्रवेश न मिलता । और सिंहके पराक्रम न करनेके कारण सम्पूर्ण मृग और वे दोनों शृगाल क्षुधारूप रोगसे व्यथित हुए एक दिशामें आश्रित हो स्थितहुए । कहा है-

फलहीनं नृपं भृत्याः कुलीनमपि चोन्नतम् । सन्त्यज्यान्यत्र गच्छन्ति शुष्कं वृक्षमिवान्डजाः ॥ १६३ ॥

भृत्यजन फलहीन कुलीन और उन्नत राजाकोभी छोड़कर अन्यत्र चले जाते हैं, जैसे शुष्क वृक्षको पक्षी ॥ १६३ ॥

तथाच- वैसेही-

अपि सम्मानसंयुक्ताः कुलीना भक्तितत्पराः । वृत्तिभंगान्महीपालं त्यजन्त्येव हि सेवकाः ॥ १६४ ॥

सम्मानसेभी संयुक्त कुलीन भक्तिमे तत्पर सेवकभी आजीविका न मिलनेसे स्वामीको त्याग देते हैं ॥ १६४ ॥

अन्यच्च- औरभी-

कालातिक्रमणं वृत्तेर्यो न कुर्वीत भूपतिः । कदाचित्तं न मुञ्चन्ति भर्त्सिता अपि सेवकाः ॥ १६५ ॥

जो राजा मासिक देनेका कालातिक्रम नहीं करता है उसको घुड़कनेसेभी सेवक कभी नहीं त्यागते हैं ॥ १६५ ॥

तथा न केवलं सेवका इत्थम्भूता यावत् समस्तमपि एतज्जगत् परस्परं भक्षणार्थं सामादिभिरुपायैस्तिष्ठति । तद्यथा-

इस प्रकारसे सेवक सम्पूर्ण जगत्को परस्पर भक्षणके निमित्त सामादि उपायोंसे स्थित रहते हैं । सो ऐसे कि-