भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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भाषाटीकासमेतम् । ( ५७ )

देशानामुपरि क्ष्माभृदातुरणां चिकित्सकाः । वणिजो ग्राहकाणां च मूर्खाणामपि पण्डिताः ॥ १६६ ॥

देशोपर राजा, रोगियोंको वैद्य, ग्राहकोको वणिक्, मूर्खोंको पण्डित॥१६६॥

प्रमादिनां तथा चौरा भिक्षुका गृहमेधिनाम् । गणिकाः कामिनाञ्चैव सर्वलोकस्य शिल्पिनः ॥ १६७ ॥

असावधानोको चोर, गृहस्थियोको फकीर, कामियोंको गणिका, और सब लोकको शिल्पी ॥ १६७ ॥

सामादिसज्जितैः पाशैः प्रतीक्षन्ते दिवानिशम् । उपजीवन्ति शक्त्या हि जलजा जलदानिव ॥ १६८ ॥

साम दानादि द्वारा लगाये पाशोंसे रात दिन देखते रहते है जैसे व्रीहि आदि मेघोंकी ( प्रतीक्षा करते हैं ) इस प्रकार सब उनकी शक्तिसे जीतें हैं॥१६८

अथवा साध्विदमुच्यते—
अथवा यह अच्छा कहा है—

सर्पाणाञ्च खलानाञ्च परद्रव्यापहारिणाम् । अभिप्राया न सिध्यन्ति तेनेदं वर्त्तते जगत् ॥ १६९ ॥

सर्प और पराये द्रव्य हरनेवाले दुष्टोंके अभिप्राय नहीं सिद्ध होते इसी कारणसे यह जगत् रक्षाको प्राप्त है ॥ १६९ ॥

अत्तुं वाञ्छति शाम्भवो गणपतेराखुं क्षुधार्त्तः फणी तं च क्रौञ्चरिपोः शिखी गिरिसुतासिंहोऽपि नागाशनम् । इत्थं यत्र परिग्रहस्य घटना शम्भोरपि स्याद्गृहे तत्रान्यस्य कथं न भावि जगतोयस्मात्स्वरूपं हितत्॥१७०॥

( देखो ) शिवजीका सर्प क्षुधित होकर गणेशजीके मूषकको खानेकी इच्छा करता है, उसको कार्तिकेयका मोर और मोरको गिरिजाका वाहन सिंह खानेकी इच्छा करता है, इसप्रकार शिवके घरमेंभी परस्पर आक्रमणकी घटना है, तो दूसरेके घरमे क्यो न होगी, कारण कि, परस्पर उपजीविकावाला जगत्का स्वरूप ही है ॥ १७० ॥

ततः स्वामिप्रसादरहितौ क्षुत्क्षामकण्ठौ परस्परं करटकदमनकौ मन्त्रयेते । तत्र दमनको ब्रूते—“आर्य्य करटक !

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