भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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पृष्ठ 73

( ५८ ) पञ्चतन्त्रम् ।

आवां तावदप्रधानतां गतौ । एष पिंगलकः सञ्जीवकानुरक्तः स्वव्यापारपराङ्मुखः सञ्जातः । सर्वोऽपि परिजनो गतः । तत्किं क्रियते” । करटक आह--“यद्यपि त्वदीयवचनं न करोति तथापि स्वामी स्वदोषनाशाय वाच्यः । उक्तञ्च--

सो स्वामीके प्रसादसे रहित भूखसे दुर्बल करटक और दमनक सम्मति करने लगे। दमनक बोला--“आर्य्य करटक ! हम तो अब अप्रधानताको प्राप्तहुए और यह पिंगलक संजीवकमें अनुरक्त होकर अपने कार्य्यसे विमुख हुआ। सब परिजन चलेगये अब क्या करें”। करटक बोला--“यद्यपि आपके वचन नहीं मानता तथापि अपने दोष नाशके लिये स्वामीसे कहना उचितहै। कहाहै किं--

अश्रृण्वन्नपि बोद्धव्यो मन्त्रिभिः पृथिवीपतिः ।
यथा स्वदोषनाशाय विदुरेणाम्बिकासुतः ॥ १७१ ॥

मंत्रियोंको राजा न सुनतेहुएभी समझाना चाहिये जैसे विदुरने धृतराष्ट्र-को अपने दोष नाश करनेके लिये समझाया था ॥ १७१ ॥

तथाच--
और देखो--

मदोन्मत्तस्य भूपस्य कुञ्जरस्य च गच्छतः ।
उन्मार्गं वाच्यतां यान्ति महामात्राः समीपगाः ॥ १७२ ॥

मदोन्मत्त राजा और हाथीके उन्मार्ग जानेमें उनके समीपी और महावत वाच्यता ( निन्दा ) को प्राप्त होते ह ॥ १७२ ॥

तत् त्वया एष शष्पभोजी स्वामिनः सकाशमानीतस्त-त्स्वहस्तेन अङ्गाराः कर्षिताः”। दमनक आह--“सत्यमेतत् । ममायं दोषो स्वामिनः । उक्तञ्च--

सो तैने यह घास खानेवाला स्वामीके निकट प्राप्त किया सो अपने हाथसे ही तैने अंगारा खेंचा”। दमनक बोला--“यह सत्य है इसमे मेरा दोषहै स्वामीका नहीं। कहाहै--

जम्बूको हुड्डुयुद्धेन वयं चाषाढभूतिना ।
दूतिका परकार्य्यण त्रयो दोषाः स्वयंकृताः ॥ १७३ ॥”

हुड्डु ( जीवविशेष ) से जम्बूक और आषाढभूतिसे हम दूसरेके कार्य्यसे दूती यह तीनों अपने दोषसे ( दूषित हुए ) ॥ १७३ ॥”