भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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भूमिका । (९)

इसका विस्तार विद्वान् कोलब्रुक साहबने अपने टीका किये पंचतंत्रकी भूमिकामें लिखा है यहाँ अप्रासंगिक जानकर वह वार्ता लिखना उचित नही है ।

इसप्रकार सर्व देशप्रचलित और विख्यात इस ग्रन्थका भाषान्तर होकर समस्त भूमंडलमे प्रकाशित होरहा है, परन्तु आजतकभी हिन्दी भाषाके भण्डारमे इसका नाम अंकित नहीं हुआ था, हां १ हितोपदेशके ऊपर कई भाषाटीका छपचुकी है जिनमें एक हितोपदेशकी भाषाटीका अपने शिष्यद्वारा निजअनुमतिसे कराय भलीप्रकार शुद्धकर कल्याणमें सम्वत् १९५० मे मुद्रित कर चुके है, परन्तु कितनीही आवश्यकीय वार्ताओंसे युक्त भूमिका, परिशिष्ट, आशय, उपदेशके मर्मसहित अत्युत्तम भाषामे पंडित बलदेवप्रसादमिश्रने अनुवाद किया है वह मुद्रित (१) होनेपर देखनेही योग्य होगा और कथा टिप्पणीके सिवाय उसमे यहभी दिखलाया है किं, हितोपदेशमे कौन श्लोक किस ग्रंथका है जिससे अनुवादकके परिश्रमका पूर्ण परिचय लक्षित होता है ।

इस समय संस्कृतका उतना प्रचार नहीं है कि, जैसा पूर्व समयमें था और हमारे आचार विचार नीति रीति धर्मादिके ग्रंथ प्रायः सब संस्कृतमें ही विद्यमान है अब कालक्रमसे प्रायः वृत्तिकी आशासे ब्राह्मणादि वर्ण विदेशीय भाषाओंमें यहां तक रुचि रखते है कि, बहुधा विदेशीय भाषाको सीखकर अपना कर्म धर्म भी विदेशीय रीति नीतिके अनुसार बदल डालना चाहते हैं, अपने शास्त्रका मर्म कुछ जानते नहीं है केवल विदेशीय टीके वा हांमे हां मिलानेवाले वा पक्षपातियोकी गप्पसेही अपनेको धर्म रीति नीतिका तत्त्वज्ञाता मानकर शास्त्रोंपर मीमांसा करने लगे हैं, कोई बालविवाहसेही देशका बिगाड़ समझकर ४८ वर्षका पुरुष २० वर्षकी कन्यासे विवाह करनेसे ही देशका उद्धार बल विद्याकी उन्नति समझते हैं, कोई शास्त्रके मर्मको बिना समझे यहां तक अधीर होगये हैं कि, जब किसी प्रकार बल नही चला तो अपना नामभी रिफार्मरोंमे होजाय इस कारण विदेशीय रीतिपर आरूढ हो ईश्वरके आगे चिल्ली पुकार कर मनकी उमंग निकालते हैं, अभी मुरादाबादसे भी विवाहविचारमें एक पुस्तक ऐसीही विचित्र लीलाकी प्रकाशित होचुकी है। कोई आगमें घी फूंकनेसे ही देश भरकी वायु शुद्ध करनेका साहस करके कुण्डोंमें प्रतिदिन आधी छटांक वा छटांकभर घी फूंककर देशको सुगंधित कररहे हैं, कोई विधवाविवाह नियोग करना धर्म शास्त्रके अनुसार कहकर अपनेको विधवाऋणसे उऋण मान देशका मुख उज्ज्वल कररहे है, कोई एक एक स्त्रीके ग्यारह पतिकी आज्ञा देकर वेदार्थके


१ इस (स० १९६६) समय इसकी द्वितीयावृत्तिभी छपके बिकरही है ।