भारतकोश
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पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

भूमिका । (९)

इसका विस्तार विद्वान् कोलब्रुक साहबने अपने टीका किये पंचतंत्रकी भूमिकामें लिखा है यहाँ अप्रासंगिक जानकर वह वार्ता लिखना उचित नही है ।

इसप्रकार सर्व देशप्रचलित और विख्यात इस ग्रन्थका भाषान्तर होकर समस्त भूमंडलमे प्रकाशित होरहा है, परन्तु आजतकभी हिन्दी भाषाके भण्डारमे इसका नाम अंकित नहीं हुआ था, हां १ हितोपदेशके ऊपर कई भाषाटीका छपचुकी है जिनमें एक हितोपदेशकी भाषाटीका अपने शिष्यद्वारा निजअनुमतिसे कराय भलीप्रकार शुद्धकर कल्याणमें सम्वत् १९५० मे मुद्रित कर चुके है, परन्तु कितनीही आवश्यकीय वार्ताओंसे युक्त भूमिका, परिशिष्ट, आशय, उपदेशके मर्मसहित अत्युत्तम भाषामे पंडित बलदेवप्रसादमिश्रने अनुवाद किया है वह मुद्रित (१) होनेपर देखनेही योग्य होगा और कथा टिप्पणीके सिवाय उसमे यहभी दिखलाया है किं, हितोपदेशमे कौन श्लोक किस ग्रंथका है जिससे अनुवादकके परिश्रमका पूर्ण परिचय लक्षित होता है ।

इस समय संस्कृतका उतना प्रचार नहीं है कि, जैसा पूर्व समयमें था और हमारे आचार विचार नीति रीति धर्मादिके ग्रंथ प्रायः सब संस्कृतमें ही विद्यमान है अब कालक्रमसे प्रायः वृत्तिकी आशासे ब्राह्मणादि वर्ण विदेशीय भाषाओंमें यहां तक रुचि रखते है कि, बहुधा विदेशीय भाषाको सीखकर अपना कर्म धर्म भी विदेशीय रीति नीतिके अनुसार बदल डालना चाहते हैं, अपने शास्त्रका मर्म कुछ जानते नहीं है केवल विदेशीय टीके वा हांमे हां मिलानेवाले वा पक्षपातियोकी गप्पसेही अपनेको धर्म रीति नीतिका तत्त्वज्ञाता मानकर शास्त्रोंपर मीमांसा करने लगे हैं, कोई बालविवाहसेही देशका बिगाड़ समझकर ४८ वर्षका पुरुष २० वर्षकी कन्यासे विवाह करनेसे ही देशका उद्धार बल विद्याकी उन्नति समझते हैं, कोई शास्त्रके मर्मको बिना समझे यहां तक अधीर होगये हैं कि, जब किसी प्रकार बल नही चला तो अपना नामभी रिफार्मरोंमे होजाय इस कारण विदेशीय रीतिपर आरूढ हो ईश्वरके आगे चिल्ली पुकार कर मनकी उमंग निकालते हैं, अभी मुरादाबादसे भी विवाहविचारमें एक पुस्तक ऐसीही विचित्र लीलाकी प्रकाशित होचुकी है। कोई आगमें घी फूंकनेसे ही देश भरकी वायु शुद्ध करनेका साहस करके कुण्डोंमें प्रतिदिन आधी छटांक वा छटांकभर घी फूंककर देशको सुगंधित कररहे हैं, कोई विधवाविवाह नियोग करना धर्म शास्त्रके अनुसार कहकर अपनेको विधवाऋणसे उऋण मान देशका मुख उज्ज्वल कररहे है, कोई एक एक स्त्रीके ग्यारह पतिकी आज्ञा देकर वेदार्थके


१ इस (स० १९६६) समय इसकी द्वितीयावृत्तिभी छपके बिकरही है ।

( १० ) पञ्चतन्त्र भाषाटीकाकी-

लोट फेर करनेसेही देशका भला और अपनेको कृतकृत्य मानते हैं, कोई चारों-वर्णोंका खान पान एक करके भारतभूमिके सुपुत्र कहलानेकी उत्कट इच्छा करते हैं, कोई फारसी अंग्रेजी पढकर ही समस्त वेदवेदांगका तत्व निरूपणकर देशका भला करनेके साहसी होरहे हैं, इत्यादि जहां देखो जहां सुनो देशसुधार जातिसुधार देशोन्नतिकी पुकार जल वायुकी शुद्धिका विचारही श्रवणगोचर होता है अब इसके फलकी ओर दृष्टि की जाती है तो सर्वथा परिणाम उलटा दृष्टि आता है, मनमें और वचनमें और कार्यमें और है, विदेशियोंकी रीतिपर लेखनी चलीजाती है, खण्डन मण्डनमें पत्र रंग दिये जाते हैं, फल क्या है, कालपडते जाते है, महामारीसे देश उजड़े जाते हैं, लोग अल्पायु निर्धन हुए जाते है, जल, वायु बिगड़े जाते है इसी वर्षको विचार लीजिये कि ( १९५३, १९५४ ) वर्षके इस अकालने देशभरमें डामाडोल मचादिया है, असंख्य भारतवासी भूखे मर गये, देशभर ‘दीयताम्’ की पुकारसे गूंजउठा है, कितनेही शहर भूखोंने लूटे, कितनीही आत्महत्यां हुई, कितनेही बिके, कितनेही अयोग्य कृत्यमें प्रवृत्त हुए, कितनेही पशुओकी भांति घासपत्तेतक खागये, चौगुने पचगुने मोल अन्न होगया, लक्ष्यों रुपया सरकारने भी व्यय किया, सनातनधर्मावलम्बी महात्माओंने सदावर्त जारी किये, दूसरे यूरपदेशोंसे भी लक्ष्यों चन्दा आया, परन्तु महाभूखसे आरत भारतके लिये वह क्या कुछ होसकता है, हमको भूखोंकी जो दशा दृष्टिगोचर हुई कि, जो भूखके मारे प्राण छोड़नाही चाहते हैं, जो जंगलमें वृक्षोंके नीचे मरणोन्मुख पड़े हैं, उनके पास कितने जल और अन्न लेकर पहुंचे है, और हो भी क्या जिसके पास स्वयं नहीं वह दूसरेको क्या देगा, श्रावण भादों दोनों महीने साफ उतरगये अग्निमें घृत चढ़ानेपर भी इन्द्रदेवने जल न दिया, इधर तो यह अन्नकष्ट उधर रोगकष्ट भी देखिये भारतवासी बहुत दिनोंसे विषूचिकासे परिचित हैं, प्रतिवर्ष प्रायः सर्व नगरोंमे हैजेका प्रादुर्भाव होता है, चौबीस घण्टेकी लड़ाईमें बहुधा मनुष्य इससे हारकर कालकवलित होते हैं, परन्तु बहुत दिनोंके परिचित होनेसे इसके नामसेही कम्पित नहीं होते थे, परन्तु इस समय जिस आकारमें (प्लेग) महामारी (ग्रन्थि विसर्प) बम्बईसे प्रगट हुई है उसे सुनकर ही बडे २ धीरजवाले थर्रागये हैं, सहस्रों मनुष्य अचानक इसके उपस्थित होनेमें कालकवलित हुए है, ज्वर और ग्रन्थि निकलते ही मनुष्यका प्राण पयान कर जाता है, घरके घर खाली होगये हैं, लक्ष्यों मनुष्य देशान्तरोंको भाग गये हैं, बीमारी भी बम्बईसे आगे चलकर पूना आदि देशोंमें फैल गई है अब भागकर भी कहाँ जाँय, एक ओर ‘दीयताम्’ और एक ओर ‘त्रायस्व’ (रक्षाकरो) की ध्वनि फैल रही है । महा-

भूमिका । ( ११ )

मारीके रोकनेके निमित्त बड़े २ उच्च श्रेणीके नवीन रीति नीतिवालोके महा-घोर प्रयत्न भी निष्फल हो रहे है । महामारीसम्बन्धी नियमावली बनचुकी है रोगी होते ही घरवालोसे पृथक् कर शहरसे दूर चिकित्सालयमे रक्खा जाय, रोगीके मरनेपर झोपडा फूकनेकी आज्ञा है, मकानमें मरे तो दोदो इंच मट्टी खुदवा कर फेंक दो, उसकी खाट कपडे जला दो, मकानका द्वार झुलस दो, प्रेतहारी दशदिनतक नगरमें न आवे, इत्यादि प्रबन्धोकी धूमसे भारतवासी तीसरा संकट भोग रहे है, अब कहाँ भागे, रेलपर कठिन जांच होती है, अनेक प्रकारसे स्त्री पुरुषोकी मनमानी परीक्षा करते है, पुलिसकी बनपडी है, कई हत्या भी इस विषयमे हो चुकी है, सन्देह होतेही लोग शिफाखाने भेजे जाते है, वहाँ उनका रामही रक्षक है, आगे महामारी न फैले इस कारण शहरोमे सफाई कराई जाती है सब कच्चे पक्के मकान चूनेसे पुताये जाते है, किसीने सत्य कहा है बारह वर्षमे घरके दिन भी फिरते है, हमने स्वय देखा है कि, जिन निकृष्ट जनोके कच्चे मकानोमे वा बाजारकी दूकानोके भीतर मट्टीका भी पोता नही लगाथा, वहाँ सरकारी आज्ञासे मट्टीकी चांदनी हो रही है, अन्न कष्ट रोग कष्ट, द्रव्य कष्ट, राज्य दंड, आदि कई कष्ट, एकसाथ उपस्थित हो रहे है बडे २ देशउद्धारक मौन हैं, हम पूछते है यह क्या हुआ, यह कैसी उन्नति हो रही है, यह वायुमे मलिनता कहाँकी आगई, पहले ऐसा सफाईका प्रबन्ध नहीं था, नई ऐसी रीति नीति नहीं थी, जिस कारणसे आप देशका सुधार कहते है वह बात नहीं थी. परन्तु तथापि राजा प्रजा आनन्दसे रहतेथे, अन्न धनका रोगका ऐसा कष्ट किसीसमय नहीं पडाथा, पुराने इतिहास ही इसके साक्षी है, तब क्या था, तब यही वार्ता थी कि, भारतवर्षकी चिकित्सा भारतवर्षके नियामक धर्मग्रंथोके अनुसारही होतीथी, जप, तप, संयम, पूजा, पाठ, सत्य, स्तुति, प्रार्थना, हवन, अन्तर्वाह्य शुद्धि, सरलता, निष्कपटता, आस्तिकता शास्त्रोकी सत् व्याख्या, निष्पक्षता आदि मनुष्यमात्र अवलम्बन कियेथे, इससे देशभर मंगलयुक्त रहता था, जबसे संस्कृत विद्याकी न्यूनता और कृत्यमे अलसता प्राप्तहुई तभीसे देशमें नये २ रोगादि कष्ट उपस्थित होनेलगे है, लोग अपनी रीति नीति भूले जाते हैं, इस कारण बहुतसे दूरदर्शी विद्वानोंने यह भार अपने ऊपर लियाहै कि, पुरातन ग्रंथोंका जहाँतक हो यथार्थ अनुवाद करके पक्षपातरहित अर्थ कियाजाय जिससे प्राचीन समयके व्यवहार दर्पणवत् महाशयोके सम्मुख उपस्थित होजॉय, मानना या न मानना यह पाठकोके आधीन है, यही विचारकर हमने भी वाल्मीकिरामायण, शिवपुराण, श्रीमद्भागवत, हरिवंशादि कितनेही ग्रन्थोंका देशभाषामे यथार्थ अनुवाद कियाहै और

( १२ ) पञ्चतन्त्र भाषाटीकाकी-

कितनेही ग्रंथोंका अनुवाद कियाजाताहै कि, जिससे विज्ञ महाशय अपने धर्म कर्मको यथार्थ जान उसमें प्रवृत्त होकर उभय लोकमें सुख प्राप्तकरें, जिसप्रकार धर्मादि करना मनुष्य मात्रका कार्य है, इसीप्रकार लोकनिर्वाह और बुद्धिकी अधिकाईके निमित्त नीतिका जाननाभी मनुष्य मात्रको उचित है, इसीकारण सब प्रकारके गुणोंसे युक्त विद्यार्थियोंको परम उपकारक इस “पंचतंत्र” ग्रंथका भाषामे अनुवाद कियाहै, ऐसा कौन है कि इसकी कथामें जिसे रुचि न हो, यह ग्रंथ सर्करी परीक्षाओंमें भी नियुक्त है और अंग्रेजीके साथ जो संस्कृत पढाई जाती है उसके साथभी इसका कोई न कोई अंश अवश्य रहता है, इसकारण संस्कृतके विद्यार्थियोंकोभी उपयोगी हो, इस निमित्त संस्कृतके शब्दोंके अनुसारही इसका भावार्थ किया है, कहीं कुछ न्यूनाधिक नहीं कियाहै और जहाँ कहीं अर्थ खोलनेके लिये कुछ विशेष लिखा है वहां कोष्ठ करादिया है और संस्कृतमें जहां वाक्य समाप्त होकर ऐसी । रेखा कर वहां भाषामें भी ऐसीही रेखा कर दीहै, जिससे विद्यार्थियोंको शब्दार्थ जाननेमें कठिनता न पडे, हाँ अन्वयानुसार अर्थ करनेके कारण श्लोकमें अधिकतर कर्तासे अर्थका करना प्रारम्भ किया है यदि ऐसा न करते तो श्लोकार्थ रुचिकर सरस न होता श्लोकका अन्वय कर पाठक उसीके अनुसार अर्थ पासकेंगे ।

इस ग्रन्थमें नीतिकी उत्कृष्टता सबका सार लेकर वर्णन की है इसकारण इस टीकेका नामभी “नीतिसर्वस्व” रक्खा है ।

इसप्रकार यह ग्रन्थ पूर्णकर जगद्विख्यात परमप्रवीण सनातनधर्म निरत सद्ग्रन्थप्रचारक परमउपकारक गुणिजनरंजक परमोदार “श्रीवेंकटेश्वर” यंत्रालयाध्यक्ष सेठजी श्रीयुत खेमराज श्रीकृष्णदासजी महाशयको सम्पूर्ण स्वत्वके सहित समर्पण करदियाहै जो कि, अपनी परम उदारतासे हमको सब प्रकार सन्तुष्ट कररहेहै ।

हिन्दी भाषाके परम रसिक हमारे परम अनुग्राहक द्विजवंशदिवाकर दानशील पंडित हरसहाय पाठक तथा कुमार बनारसी दासजी एम. ए. बाबू उदित नारायण लाल वर्मा प्लीडर गाजीपुर तथा पंडित हरिहर प्रसाद पाठक मेनेजर “सत्यसिंधु”, लाला शालिग्रामजी वैश्य, सेठ कुन्दन लाल आदि विज्ञ जनभी धन्य वादके योग्य हैं जो हिन्दी भाषाके प्रचारमें सदा रत रहते हैं ।

पाठक महाशयोंसे प्रार्थना है कि, यथाशक्ति टीका करनेमें कोई त्रुटि नहीं की है तथापि यदि कहीं भूल चूक पावै तो उसे क्षमा करें कारण कि, सर्वज्ञ परमेश्वरहीहैं ।

भूमिका । ( १३ )

विदेशीय महाशयोंने जो हमारे ग्रन्थोंको देख प्रशंसापत्र भेजे हैं उनको हम अन्तःकरणसे धन्यवाद देते हैं ।

और अबकी बार फिर भी भलीभांति संशोधन कर उत्तम व्यवस्थासे छपकर तैयार हुआ है, आशा है कि, नीतिप्रिय महाशय इसे ग्रहणकर स्वयं अमूल्य लाभ उठावेंगे और ग्रन्थकार टीकाकार एवं प्रकाशकको सफल मनोरथ करेंगे ।

पण्डित ज्वालाप्रसाद मिश्र,
दीनदार पुरा-मुरादाबाद.

अथ पञ्चतन्त्रकी कथासूची ।


विषय.पृष्ठ.
कथामुख .... ... ... ... ... ....

मित्रभेद प्रथम तन्त्र । ६

विषय.पृष्ठ.
१ वानरोके यूथकी कथा... ... ... ... ....१३
२ शृगाल और भेरीकी कथा ... ... ... ...३५
३ दन्तिलकी कथा ... ... ... ...४६
४ देवशर्मा परिव्राजकादिकी कथा ... ... ... ...५९
५ विष्णुरूपकौलिककी कथा ... ... ... ...८०
६ काकी और कनक सूत्रकी कथा... ... ... ...९३
७ बक और कर्कटकी कथा ... ... ... ...९४
८ भासुरक सिंहकी कथा ... ... ... ...१०१
९ मत्कुण मन्दविसर्पिणीकी कथा ... ... ... ...११५
१० चण्डरव शृगालकी कथा ... ... ... ...११९
११ मदोत्कट सिंहकी कथा ... ... ... ...१३०
१२ टिट्टिभ और समुद्रकी कथा ... ... ... ...१४२
१३ दुर्बुद्धिकूर्मकी कथा ... ... ... ... ...१४४
१४ अनागत विधाता आदि तीन मच्छोकी कथा.... ... ...१४७
१५ चटकी काष्ठकूटकी कथा ... ... ... ...१५२
१६ वज्रदंष्ट्र सिंहकी कथा... ... ... ... ...१६७
१७ सूचीमुख वानरकी कथा ... ... ... ...१७८
१८ चटक दम्पतीकी कथा ... ... ... ....१८०
१९ धर्मबुद्धि ग्राम्यबुद्धिकी कथा ... ... ... ...१८३
२० मूर्ख बक और नोलेकी कथा ... ... ... ....१८९
२१ जीर्णधन वणिक् पुत्रकी कथा ... ... ... ...१९१
२२ मूर्ख वानर और राजाकी कथा ... ... ... ...१९५

मित्रसम्प्राप्ति द्वितीय तंत्र । २०२

विषय.पृष्ठ.
चित्रग्रीव उपाख्यान ... ... ... ... ....२०३
हिरण्यक लघुपतनक संवाद ... ... ... ....२१३

पञ्चतन्त्रकी कथासूची । ( १५ )

विषयपृष्ठ-
१ हिरण्यक वृत्तान्तकी कथा . .२२७
२ तिल बेचने वालीकी कथा . ..२३२
३ पुलिन्दकी कथा .. ... . ...२३४
४ सागरदत्त वणिककी कथा . ....२४७
५ सोमलिककी कथा ... .२५८
६ वृषभके पीछे फिरनेवाले शृगालकी कथा .२५४

काकोलूकीय तृतीय तन्त्र । २८८

काक उलूक वृत्तान्त .. . | २८८ १ चतुर्दन्त हाथोकी कथा ... .. .. | ३१० २ शशकपिजलकी कथा ... .. ... | ३१६ ३ ब्राह्मण और बकरेकी कथा ... ... | ३२६ ४ सर्प और चैंटियोकी कथा ... . | ३२९ ५ हरिदत्त ब्राह्मणकी कथा . ... | ३३६ ६ पद्मवनके हंसोकी कथा . .. .... | ३३८ ७ व्याधकी कथा .. . | ३४१ ८ वृद्ध वणिक्की कथा ... .. .. | ३४९ ९ चोर और राक्षसकी कथा . .. .... | ३५२ १० वल्मीक और उदरके सर्पकी कथा . | ३५५ ११ रथकार और उसकी स्त्रीकी कथा .. ... . .. | ३५८ १२ मूषिकाकी कथा .. . .. | ३६४ १३ स्वर्णष्ठीवीकी कथा . - | ३७१ १४ खर नखर सिंहकी कथा . .. | ३७४ १५ मन्दविष सर्पकी कथा .. | ३८३ १६ घृतान्ध ब्राह्मणकी कथा . .. | ३८६

लब्धप्रणाश चतुर्थ तंत्र । ३८७

१ जलस्थित वानरकी कथा . ... | ३९७ २ गंगदत्त मण्डूककी कथा ... | ४०६ ३ करालकेशर सिंहकी कथा . . . | ४१५ ४ कुम्भकारकी कथा ... ... . | ४२२ ५ सिंह और गीदड़की कथा .. | ४२४

( १६ ) पञ्चतन्त्रकी कथासूची ।

विषय. पृष्ठ. ६ ब्राह्मणीकी कथा .... ... ... ... .... ४२८ ७ नन्दराजाकी कथा .... ... ... ... ... ४३२ ८ शुद्ध पट रजककी कथा .... ... ... ... ... ४३४ ९ हालिककी स्त्रीकी कथा .... ... ... ... ४३८ १० घंटाबन्ध ऊंटकी कथा ... ... ... ... ४४३ ११ चतुरक शृगालकी कथा ... ... ... .... ४४७ १२ चित्रांग सारमेयकी कथा ... .... .... .... ४५२

अपरीक्षित कारक पंचम तंत्र । ४५५

१ मणिभद्रनाम सेठकी कथा ... ... ... ... ४५५ २ ब्राह्मणी और नौलेकी कथा ... ... .... .... ४६३ ३ मस्तकपर चक्र भ्रमण करनेवालेकी कथा ... ... ... ४६५ ४ सिंह बनाने वाले ब्राह्मणोंकी कथा ... ... ... ४७३ ५ मूर्ख पण्डितोंकी कथा .... ... ... .... ४७५ ६ शतबुद्धि आदि मत्स्योकी कथा .... ... ... ... ४८० ७ गर्दभ और शृगालकी कथा .... ... ... ... ४८३ ८ मन्थर कौलिककी कथा ... .... .... ... ४८७ ९ सोमशर्माके पिताकी कथा ... ... .. .... ४९२ १० चन्द्रराजाकी कथा ... ... ... .... .... ४९४ ११ राक्षस और राजकन्याकी कथा ... .... ... ... ५०४ १२ अन्धे कुबडे और तीनस्तनवाली राजकन्याकी कथा ... ... ५०८ १३ चण्डकर्मा राक्षस और ब्राह्मणकी कथा .... ... ... ५०९ १४ भारण्डपक्षीकी कथा ... ... ... ... ५१५ १५ कैंकडे और ब्राह्मणकी कथा ... ... . ... ५१७

इति कथासूची समाप्ता ।

॥ श्रीः ॥

अथ पंचतन्त्रम् ।

भाषाटीकासहितम् ।


ब्रह्मा रुद्रः कुमारो हरिवरुणयमा वह्निरिन्द्रः कुबेर- श्चन्द्रादित्यौ सरस्वत्युदधियुगनगा वायुरुर्वी भुजङ्गाः । सिद्धानद्योऽश्विनौ श्रीर्दितिरदितिसुता मातरश्चाण्डिकाद्या वेदास्तीर्थानि यज्ञा गणवसुमुनयः पान्तु नित्यं ग्रहाश्च ॥१॥

मया ज्वालाप्रसादेन नमस्कृत्य गजाननम् । क्रियते पञ्चतंत्रस्य भाषाटीका मनोरमा ॥

दोहा-शभु शिवा रघुपति सिया, बन्दौं पवनकुमार । कृपा करहु जन जान मोहिं, गुणागार सुखसार ॥

ब्रह्मा, शिव, कार्तिकेय, विष्णु, वरुण, यम, अग्नि, इन्द्र, कुबेर, चन्द्र, सूर्य्य, सरस्वती, सागर, चारोंयुग, पर्वत, वायु, पृथ्वी, वासुकि आदि सर्प, कपिलादि सिद्ध, नदी, अश्विनीकुमार, लक्ष्मी, दिति ( कश्यपपत्नी ), अदितिके पुत्र ( देवता ), चण्डिकाआदि मातायें, वेद ( ऋक्, यजु, साम, अथर्व ), तीर्थ ( पुण्यक्षेत्र काशी आदि ), यज्ञ ( दर्श पौर्णमासादि ), गण ( प्रमथादि ), वसु ( आठ देव ), मुनि ( व्यासादि ), ग्रह ( सूर्यादि ), नित्य ( हमारी ) रक्षा करें । स्रग्धरा छन्द है ॥ १ ॥

मनवे वाचस्पतये शुक्राय पराशराय ससुताय । चाणक्याय च विदुषे नमोऽस्तु नयशास्त्रकर्तृभ्यः ॥२॥

स्वायम्भू मनु, वृहस्पति, शुक्र, सपुत्र ( व्याससहित ) पराशर, पण्डित चाणक्य और नीतिशास्त्रके बनानेवालोके निमित्त नमस्कार है ॥ २ ॥

(२) पञ्चतन्त्रम् ।

सकलार्थशास्त्रसारं जगति समालोक्य विष्णुशर्मेदम् । तन्त्रैः पञ्चभिरेतच्चकार सुमनोहरं शास्त्रम् ॥ ३ ॥

इस प्रकार विष्णुशर्माने इस जगत्में सम्पूर्ण अर्थशास्त्रका सार देखकर पंच-तंत्रोंमे यह मनोहर शास्त्र निर्माण किया है ॥ ३ ॥

तद्यथा अनुश्रूयते-अस्ति दाक्षिणात्ये जनपदे महिलारोप्यं नाम नगरम् । तत्र सकलार्थिकल्पद्रुमः प्रवरमुकुटमणिमरीचिमञ्जरीचर्चितचरणयुगलः सकलकलापारंगतोऽमरशक्तिर्नाम राजा बभूव । तस्य त्रयः पुत्राः परमदुर्मेधसो बहुशक्तिरुग्रशक्तिरनन्तशक्तिश्चेतिनामानो बभूवुः । अथ राजा तान् शास्त्रविमुखान् आलोक्य सचिवान् आहूय प्रोवाच- “भो ! ज्ञातमेतद्भवद्भिः यन्ममैते पुत्राः शास्त्रविमुखा विवेकरहिताश्च । तत् एतान् पश्यतो मे महदपि राज्यं न सौख्य मावहति । अथवा साध्विदमुच्यते-

सो ऐसा सुना है कि, दक्षिणके देशमें एक महिलारोप्यनाम नगरहै । वहां सम्पूर्ण याचकोंके ( मनोरथ पूर्ण करनेको ) कल्पवृक्ष, बडे बडे निर्जित राजाओंकी मुकुटमणियोँकी किरणोंके समूहसे पूजित चरणयुगल, सम्पूर्ण कलाओंका पारगामी, अमरशक्ति नाम राजा था, उसके तीन पुत्र अतिदुर्बुद्धि--बहुशक्ति, उग्रशक्ति, अनन्तशक्ति नामवाले थे । तब राजा उनको शास्त्रसे विमुख देखकर मन्त्रियोंको बुलाकर बोला--“क्या यह आपको विदित है कि, जो यह मेरे पुत्र शास्त्रसे विमुख विवेक रहित हैं । सो इनको देखकर मुझको यह बडा राज्य सुख नहीं देता है । अथवा किसीने यह अच्छा कहा है कि-

अजातमृतमूर्खेभ्यो मृताजातौ सुतौ वरम् । यतस्तौ स्वल्पदुःखाय यावज्जीवं जडो दहेत् ॥ ४ ॥

न हुए, होकर मरगये और मूर्ख इन (तीन प्रकारके ) पुत्रोंमे नहुए और होकर मरगये भले हैं, कारण कि, वे दोनों थोडे दुःखके निमित्त है, मूर्ख तो जन्मपर्यन्त जलाता है ॥ ४ ॥

वरं गर्भस्रावो वरमृतुषु नैवाभिगमनं वरं जातप्रेतो वरमपि च कन्यैव जनिता ।

भाषाटीकासमेतम् । ( ३ )

वरं वन्ध्या भार्या वरमपि च गर्भेसु वसति-
र्न चाविद्वान्रूपद्रविणगुणयुक्तोपि तनयः ॥ ५ ॥

गर्भका स्राव होजाना अच्छा है, ऋतुमें स्त्रीके निकट न जाना अच्छा है, उत्पन्न होतेही मरजाना अच्छा है, वा कन्याही होनी अच्छी है, भार्याका वन्ध्या-होनाभी भला, वा गर्भमें रहनाही भला है, परन्तु अपण्डित रूप-द्रव्यसम्पन्नभी पुत्र अच्छा नहीं है ॥ ५ ॥

किं तया क्रियते धेन्वा या न सूते न दुग्धदा ।
कोऽर्थः पुत्रेण जातेन यो न विद्वान्न भक्तिमान् ॥ ६ ॥

उस गौसे क्या किया जाय, जो न जनती है, न दूध देती है, उस पुत्रसे क्या है, जो न विद्वान् है न भक्तिमान् है ॥ ६ ॥

वरमिह वा सुतमरणं मा मूर्खत्वं कुलप्रसूतस्य ।
येन विबुधजनमध्ये जारज इव लज्जते मनुजः ॥ ७ ॥

इस जगत्में पुत्रका मरण अच्छा है, परन्तु कुलोत्पन्न पुत्रका मूर्ख होना भला नहीं, जिससे विद्वानोंके बीचमें मनुष्य जारोत्पन्नकी समान लज्जित होताहै ॥ ७ ॥

गुणिगणगणनारम्भे न पतति काठिनी ससम्भ्रमा यस्य ।
तेनाम्बा यदि सुतिनी वद वन्ध्या कीदृशी भवति ॥ ८ ॥

गुणिजनोंकी गणनाके आरम्भमें जिसकी रेखा भूलसेभी नहीं गिरती है, यदि उसीसे उसकी माता पुत्रवती है, तो कहो वन्ध्या कैसी होती है ? ॥ ८ ॥

तदेतेषां यथा बुद्धिप्रकाशो भवति तथा कोऽप्युपायोऽनुष्ठीयताम् । अत्र च मदत्तां वृत्तिं भुञ्जानानां पण्डितानां पञ्चशती तिष्ठति । ततो यथा मम मनोरथाः सिद्धिं यान्ति तथा अनुष्ठीयताम्” इति । तत्रैकः प्रोवाच-“देव ! द्वादशभिर्वर्षैर्व्याकरणं श्रूयते, ततो धर्मशास्त्राणि मन्वादीनि, अर्थशास्त्राणि चाणक्यादीनि, कामशास्त्राणि वात्स्यायनादीनि । एवं च ततो धर्मार्थकामशास्त्राणि ज्ञायन्ते । ततः प्रतिबोधनं भवति” । अथ तन्मध्यतः सुमतिर्नाम सचिवः प्राह-“अशाश्वतोऽयं जीवितव्यविषयः । प्रभूतकालज्ञेयानि शब्द-

( ४ ) पञ्चतन्त्रम् ।

शास्त्राणि । तत्संक्षेपमात्रं शास्त्रं किञ्चिदेतेषां प्रबोधनार्थं चिन्त्यतामिति । उक्तञ्च यतः-

सो जैसे इनकी बुद्धिमें प्रकाश हो वैसा कोई उपाय कियाजावै। यहां मेरी दीहुई आजीविकाको भोगते हुए पांचसौ पंडित हैं। सो जैसे मेरे मनोरथ सिद्ध हो, वैसा अनुष्ठान करो"। उनमें एक बोला-"देव ! बारह वर्षमें व्याकरण पढ़ा-जाता है, फिर धर्मशास्त्र मनुआदिके, अर्थशास्त्र चाणक्यादि, कामशास्त्र वात्स्या-यनादि, इसके उपरान्त फिर धर्म, अर्थ, कामशास्त्र जाने जाते हैं, तब ज्ञान होताहै"। तब उनमेंसे सुमति नाम मन्त्री बोला-"यह जीवन विषय अनित्य है, बहुत शब्दशास्त्र बहुत दिनोंमें पढ़ेजाते हैं, सो कोई संक्षेपमात्र शास्त्र इनके ज्ञानके निमित्त विचार करो, कहा भी है-

अनन्तपारं किल शब्दशास्त्रं स्वल्पं तथायुर्बहवश्च विघ्नाः ।
सारं ततो ग्राह्यमपास्य फल्गु हंसैर्यथा क्षीरमिवान्बुमध्यात्।

शब्दशास्त्रका पार नहीं है, अवस्था थोड़ी और विघ्न बहुत हैं, इस कारण सारको ग्रहण करै, असारको त्याग दे, जैसे हंस जलमेंसे दूध निकाल लेते हैं. उपजाति वृत्त है ॥ ९ ॥

तदत्रास्ति विष्णुशर्मा नाम ब्राह्मणः सकलशास्त्रपारङ्गम-श्छात्रसंसदि लब्धकीर्त्तिः तस्मै समर्पयतु एतान् । स नूनं द्राक् प्रबुद्धान् करिष्यति" इति । स राजा तदाकर्ण्य विष्णुशर्माणमाहूय प्रोवाच-"भो भगवन् ! मदनुग्रहार्थमेतान् अर्थशास्त्रं प्रति द्राग्यथा अनन्यसदृशान् विद्धासि तथा कुरु। तदा अहं त्वां शासनशतेन योजयिष्यामि"। अथविष्णुशर्मा तं राजानमूचे-"देव ! श्रूयतां मे तथ्यवचनमानाहं विद्याविक्रयं शासनशतेनापि करोमि। पुनरेतांस्तव पुत्रान् मासषट्केन यदि नीतिशास्त्रज्ञान् न करोमि ततः स्वनामत्योगं करोमि । किं बहुना, श्रूयतां ममैष सिंहनादः नाहमर्थलिप्सुर्ब्रवीमि । ममाशीतिवर्षस्य व्यावृतसर्व्वेन्द्रियार्थस्य न किञ्चिदर्थेन प्रयोजनं किन्तु त्वत्प्रार्थनासिद्धयर्थं सरस्वतीविनोदं करि-

भाषाटीकासमेतम् ! (५)

ष्यामि। तल्लिख्यतामद्यतनो दिवसः। यदि अहं षण्मासाभ्यन्तरे तव पुत्रान् नयशास्त्रं प्रति अनन्यसदृशान् न करिष्यामि ततो नार्हति देवो देवमार्गं सन्दर्शयितुम्”। अथासौ राजा तां ब्राह्मणस्यासंभव्यां प्रतिज्ञां श्रुत्वा ससचिवः प्रहृष्टो विस्मयान्वितः तस्मै सादरं तान् कुमारान् समर्प्य परां निर्वृत्तिमाजगाम। विष्णुशर्म्मणापि तानादाय तदर्थं मित्रभेद-मित्रप्राप्ति-काकोलूकीय-लब्धप्रणाश-अपरीक्षितकारकाणि चेति पञ्च तन्त्राणिरचयित्वा पाठितास्ते राजपुत्राः। तेऽपि तानि अधीत्य मासषट्केन यथोक्ताः संवृत्ताः। ततः प्रभृति एतत्पञ्चतन्त्रकं नाम नीतिशास्त्रं बालावबोधनार्थं भूतले प्रवृत्तम्। किं बहुना।

सो यहा एक विष्णुशर्मा नाम ब्राह्मण सब शास्त्रका पारगामी विद्यार्थियोंमें प्राप्त यशवाला है, उसके निमित्त इन पुत्रोंको समर्पण करदो वह अवश्य शीघ्र इनको ज्ञानवान् करदेगा”। वह राजा यह वचन सुन विष्णुशर्माको बुलाकर बोला-“भगवन् ! मुझपर कृपाकर इन मेरे पुत्रोंको अर्थशास्त्रमें शीघ्रही असाधारण जैसे बनें तैसे करो। तो मै तुमको सौ सङ्ख्याक सम्भत् दूंगा”। तब विष्णुशर्मा उस राजासे कहने लगा-“देव ! मेरा सत्य वचन सुनो, मैं सम्पत्से विद्याविक्रय नहीं करताहू, परन्तु इन तुम्हारे पुत्रोंको यदि छः महीनेमे नीतिशास्त्रका ज्ञाता न करू तो अपना नाम त्यागकरू। बहुत कहनेसे क्या है मेरा यह सिंहवद्गर्जन सुनो धनकी इच्छामे मैं नहीं कहताहूं। मुझ अस्सी वर्षके सब इन्द्रियोंके भोग्यसे निस्पृह हुएको अर्थसे कुछ प्रयोजन नहीं है, परन्तु तुम्हारी प्रार्थना सिद्धिके निमित्त सरस्वती विनोद करूगा। सो आजका दिन लिखिये जो मैं छः महीनेमें तुम्हारे पुत्रोंको विद्यामें असाधारण (जिसके बराबर कोई नहो) न करू तो जगदीश्वर मुझको देवमार्ग (स्वर्ग) न दिखावे”। तब यह राजा इस ब्राह्मणकी असम्भाव्य (असम्भावसी) प्रतिज्ञाको सुनकर, मन्त्रियों सहित प्रसन्न हो, विस्मयको प्राप्त हुआ। उसके निमित्त आदरसे उन कुमारोंको समर्पणकर, अत्यन्त सन्तोषको प्राप्त हुआ। विष्णुशर्मानेभी उनको ले उनके निमित्त मित्रभेद, मित्रसम्प्राप्ति, काकोलूकीय, लब्धप्रणाश, अपरीक्षितकारक इन पाच

प्रथम तन्त्र : मित्रभेद

( ६ ) पञ्चतन्त्रम् ।

तन्त्रोंको निर्माणकर उन राजकुमारोंको पढाये । वेभी उनको पढकर छः महीनेमें, जैसा कहाथा वैसेहुए । उस दिनसे यह पंचतन्त्र नामक नीतिशास्त्र बालकोंके ज्ञानके निमित्त पृथ्वीमें विख्यात हुआहै बहुत क्या-

अधीते य इदं नित्यं नीतिशास्त्रं शृणोति च ।
न पराभवमाप्नोति शक्रादपि कदाचन ॥ १० ॥
कथामुखमेतत् ।

जो इस नीतिशास्त्रको पढता और सुनताहै, वह कभी इन्द्रसेभी पराभवको प्राप्त नहीं होताहै ॥ १० ॥

इति पण्डितज्वालाप्रसादमिश्रकृतायां पञ्चतंत्रभाषाटीकायां कथामुखं समाप्तम् ।


अथ मित्रभेदोनाम प्रथमं तंत्रम् ।

अथातः प्रारभ्यते मित्रभेदो नाम प्रथमं तन्त्रम् । यस्यायमादिमः श्लोकः-

इसके अनन्तर मित्रभेद नामवाला प्रथम तन्त्रका प्रारम्भ करते हैं । जिसकी आदिमें यह श्लोकहै-

वर्द्धमानो महान्स्नेहः सिंहगोवृषयोर्वने ।
पिशुनेनातिलुब्धेन जम्बुकेन विनाशितः ॥ १ ॥

सिंह और बैलका, वनमे वढाहुआ महास्नेह चुगुल लालची जम्बुक (गीदड) ने विनाशकर दिया ॥ १ ॥

तद्यथा अनुश्रूयते-अस्ति दाक्षिणात्ये जनपदे महिलारोप्यं नाम नगरम् । तत्र धर्मोपार्जितभूरिविभवो वर्द्धमानको नाम वणिक्पुत्रो बभूव । तस्य कदाचिद्रात्रौ शय्यारूढस्य चिन्ता समुत्पन्ना । "यत्प्रभूतेऽपि वित्ते अर्थोपायाश्चिन्तनीयाः कर्त्तव्याश्चेति । यत उक्तञ्च-

सो यह सुनाजाता है कि, दक्षिण देशमें महिलारोप्यनाम एक नगर है वहां धर्मसे महाधन उपार्जन कर्ता वर्द्धमान नामक वणिक् पुत्र था । उसको एक समय

भाषाटीकासमेतम् । ( ७ )

रात्रीमे खाटमें लेटेहुए चिन्ता उत्पन्न हुई; कि “बहुत धन उत्पन्न होनेपरभी धनप्राप्तिका उपाय चिन्ता करना चाहिये कहाभी है—

न हि तद्विद्यते किञ्चिद्यदर्थेन न सिद्ध्यति ।
यत्नेन मतिमाँस्तस्मादर्थमेकं प्रसाधयेत् ॥ २ ॥

ऐसी कोई वस्तु नहीं जो अर्थसे सिद्ध न होती हो इस कारण बुद्धिमान् यत्नसे अर्थका उपार्जन करे ॥ २ ॥

यस्यार्थास्तस्य मित्राणि यस्यार्थास्तस्य बान्धवाः ।
यस्यार्थाः स पुमांल्लोके यस्यार्थाः स च पण्डितः ॥ ३ ॥

जिसके धन है उसके मित्र हैं, जिसके धन है उसीके बंधु हैं, जिसके धन है लोकमे वही पुरुष है, जिसके धन है वही पंडित है ॥ ३ ॥

न सा विद्या न तद्दानं न तच्छिल्पं न सा कला ।
न तत्स्थैर्य्यं हि धनिनां याचकैर्यन्न गीयते ॥ ४ ॥

न वह विद्याहै, न वह दान है, न वह कारीगरी है, न वह कला है, न वह धनियोंकी स्थिरता है, जिसको याचक न गाते हो ॥ ४ ॥

इह लोके हि धनिनां परोऽपि स्वजनायते ।
स्वजनोऽपि दरिद्राणां सर्वदा दुर्जनायते ॥ ५ ॥

इस लोकमें धनियोंके गैरभी स्वजन होजाते हैं, दरिद्रोंके कुटुम्बी भी सदा दुर्जन होजाते हैं ॥ ५ ॥

अर्थेभ्योऽपि हि वृद्धेभ्यः संवृत्तेभ्यस्ततस्ततः ।
प्रवर्त्तन्ते क्रियाः सर्वाः पर्वतेभ्य इवापगाः ॥ ६ ॥

धनके बढनेसे और इधर उधर इकट्ठे होनेसे सब क्रिया प्रवृत्त होती हैं, जैसे पर्वतोंसे नदिया ( निकल कर सब कार्य पूर्ण करती हैं ) ॥ ६ ॥

पूज्यते यदपूज्योऽपि यदगम्योऽपि गम्यते ।
वन्द्यते यदवन्द्योऽपि स प्रभावो धनस्य च ॥ ७ ॥

अपूज्यभी ( धनसे ) पूजित होता है, अगम्यके निकटभी जाया जाता है, अनमस्कारी पुरुषभी वन्दन योग्य होता है, यह प्रभाव धनकाही है ॥ ७ ॥

अशनादिन्द्रियाणीव स्युः कार्याण्यखिलान्यपि ।
एतस्मात्कारणाद्वित्तं सर्वसाधनमुच्यते ॥ ८ ॥

( ८ ) पञ्चतन्त्रम् ।

भोजन करनेसे जैसे सब इन्द्रिय ( समर्थ होती हैं ) इसीप्रकार सम्पूर्ण कार्य धनसे ( होते हैं ), इस कारणसे धन सबका साधन कहा जाता है ॥ ८ ॥

अर्थार्थी जीवलोकोऽयं श्मशानमपि सेवते ।
त्यक्त्वा जनयितारं स्वं निःस्वं गच्छति दूरतः ॥ ९ ॥

धनकी इच्छासे यह प्राणी श्मशानकोभी सेवन करता है, निर्धन अपने उत्पन्न करनेवालेको भी छोडकर दूर जाता है ॥ ९ ॥

गतवयसामपि पुंसां येषामर्था भवन्ति ते तरुणाः ।
अर्थेन तु ये हीना वृद्धास्ते यौवनेऽपि स्युः ॥ १० ॥

वृद्ध पुरुषोंमेभी जिनके धन हैं वे तरुण हैं, जो धनसे हीन हैं, वे युवा अवस्थामें ही वृद्ध होते हैं ॥ १० ॥

स चार्थः पुरुषाणां षड्भिरुपायैर्भवति भिक्षया, नृपसेवया, कृषिकर्मणा, विद्योपार्जनेन, व्यवहारेण, वणिक्कर्मणा वा । सर्वेषामपि तेषां वाणिज्येन अतिरस्कृतोऽर्थलाभः स्यात् । उक्तञ्च यतः—

वह धन पुरुषोंको छः उपायोंसे मिलता है, भिक्षा, राजसेवा, खेतीका कार्य, विद्याउपार्जन, लेनदेन वा वणिक्कर्मसे । इन सबमें वाणिज्यसे सर्वसम्मत लाभ होता है।

कृता भिक्षाऽनेकैर्वितरति नृपो नोचितमहो
कृषिः क्लिष्टा विद्या गुरुविनयवृत्त्यातिविषमा ।
कुसीदाद्दारिद्र्यं परकरगतग्रन्थिशमना-
न्न मन्ये वाणिज्यात्किमपि परमं वर्त्तनमिह ॥ ११ ॥

अनेक पुरुषोंने भिक्षा की है, राजाभी योग्य वृत्ति नहीं देता है, खेती क्लेशदायिनी है, विद्या गुरुकी विनयवृत्तिसे अति विषम है, व्याजसे भी दरिद्र होता है, कारण कि, दूसरेके ¹हाथमे आनेसे ग्रन्थिशमन हो जाय, वाणिज्यसे अधिक कोईभी जीवनोपाय नहीं मानताहूं । शिखरिणी छन्द है ॥ ११ ॥

उपायानाञ्च सर्वेषामुपायः पण्यसंग्रहः ।
धनार्थं शस्यते ह्येकस्तदन्यः संशयात्मकः ॥ १२ ॥


१ कोई धरोहर मारले ।

भाषाटीकासमेतम् । (९)


सम्पूर्ण उपायोमे बेचने योग्य द्रव्यका सग्रहही एक उत्तम है और सशयात्मक है ॥ १२ ॥

तच्च वाणिज्यं सप्तविधमर्थागमाय स्यात्तद्यथा गान्धिकव्यवहारो, निक्षेपप्रवेशो, गोष्ठिककर्म, परिचितग्राहकागमो, मिथ्याक्रयकथनं, कूटतुलामानं, देशान्तराद्भांडानयनञ्चेति । उक्तञ्च-

वह वाणिज्य सातप्रकारका धनके निमित्त होता है, गन्धद्रव्यका व्यवसाय, निक्षेप प्रवेश अर्थात् रुपयेका अपने यहा जमा करना उसे व्याज देना, गोसम्बन्धीकर्म, पहचाने हुए ग्राहकोंका आना ( कारण कि, जानाहुआ ग्राहक दुरुक्ती नहीं करता है ), वस्तुका मिथ्या मोल कहना ( थोडे मूल्यमें खरीद कर अधिक मोल बताना ), कमती तोलना, देशान्तरोंसे बरतन द्रव्यादिका लाना, कहा है कि-

पण्यानां गान्धिकं पण्यं किमन्यैः काञ्चनादिभिः । यत्रैकेन च यत्क्रीतं तच्छतेन प्रदीयते ॥ १३ ॥

बेचने योग्य द्रव्योंमे सुगन्धि द्रव्यका व्यापार श्रेष्ठ है और दूसरे सुवर्णादिसे क्याहै; जो कि, एकसे मोल लेकर सौको बेचा जाता है॥ १३ ॥

निक्षेपे पतिते हर्म्ये श्रेष्ठी स्तौति स्वदेवताम् । निक्षेपी म्रियते तुभ्यं प्रदास्याम्युपयाचितम् ॥ १४ ॥

धरोहर घरमे आनेसे सेठ अपने देवताकी स्तुति करता है कि, यदि यह धरोहरवाला मर जाय, तो मै तुझको अभिमत वस्तुसे पूजन करूंगा ॥ १४ ॥

गोष्ठिकर्मनियुक्तः श्रेष्ठी चिन्तयति चेतसा हृष्टः । वसुधा वसुसंपूर्णा मयाद्य लब्धा किमन्येन ॥ १५ ॥

गोष्टीकर्ममें नियुक्त हुआ श्रेष्ठी प्रसन्न मनहो विचारता है, मैने धनसे पूर्ण पृथ्वीकी प्राप्ति की और क्या चाहिये ॥ १५ ॥

परिचितमागच्छन्तं ग्राहकमुत्कण्ठया विलोक्यासौ । हृष्यति तद्धनलुब्धो यद्वत्पुत्रेण जातेन ॥ १६ ॥

पहचाने ग्राहकको आता हुआ देखकर उत्कठासे यह उसके धनसे ऐसे प्रसन्न होताहै; जैसे पुत्र उत्पन्न होनेसे ॥ १६ ॥

( १० ) पञ्चतन्त्रम् ।

अन्यच्च–
औरभी–

पूर्णापूर्णे माने परिचितजनवञ्चनं तथा नित्यम् ।
मिथ्याक्रयस्य कथनं प्रकृतिरियं स्यात्किरातानाम् ॥ १७ ॥

पूराकमती तोलकर नित्य पहचाने जनका वंचन करना, मिथ्या मोल कहना यह किरातोंकी प्रकृति है ॥ १७ ॥

अन्यच्च–
औरभी–

द्विगुणं त्रिगुणं वित्तं भाण्डक्रयविचक्षणाः ।
प्राप्नुवन्त्युद्यमाल्लोका दूरदेशान्तरं गताः ॥ १८ ॥”

भाण्डके बेचनेमें चतुर दुगुने तिगुने धनको दूरदेशमें जानेवाले मनुष्य उद्यमसे प्राप्त होते हैं ॥ १८ ॥”

इत्येवं सम्प्रधार्य्य मथुरागामीनि भाण्डानि आदाय शुभायां तिथौ गुरुजनानुज्ञातः सुरथाधिरूढः प्रस्थितः । तस्य च मंगलवृषभौ सञ्जीवकनन्दकनामानौ गृहोत्पन्नौ धूर्वोढारौ स्थितौ ॥ तयोरेकः सञ्जीवकाभिधानो यमुना कच्छमवतीर्णः सन् पङ्कपूरमासाद्य कलितचरणो युगभंगं विधाय निषसाद । अथ तं तदवस्थमालोक्य वर्द्धमानः परं विषादमगमत । तदर्थं च स्नेहार्द्रहृदयः त्रिरात्रं प्रयाणभंगमकरोत् । अथ तं विषण्णमालोक्य सार्थिकैरभिहितम्–“भोः श्रेष्ठिन् ! किमेवं वृषभस्य कृते सिंहव्याघ्रसमाकुले बह्वपायेऽस्मिन् वने समस्तसार्थः त्वया सन्देहे नियोजितः । उक्तञ्च–

इस प्रकार मनमें विचार, मथुराके जानेवाले भाण्डोंको लेकर, शुभ तिथिमें गुरुजनोंकी आज्ञालेकर, रथपर चढकर चला, उसके दो मंगलवृषभ संजीवक, नन्दक, नामवाले घरमें उत्पन्न हुये भारवाहक थे; उनमें एक संजीवक नामवाला बैल यमुनाके अनूप देशमें प्राप्त होकर, महादलदलमें फँसनेके कारण लंगडी टांग होकर जुआ गिराय स्थित हुआ । उसकी यह दशा देखकर वर्द्धमान परम विषादको प्राप्त हुआ और उसके निमित्त प्रेमसे आर्द्रहृदय होकर तीन रात्रितक

भाषाटीकासमेतम् । ( ११ )

गमन न किया । तब उसको दुःखी देख साथियोंने कहा- "भो सेठ ! क्यो इस बैलके निमित्त सिंह व्याघ्रसे युक्त अनेक विपत्तिवाले इस वनमें सम्पूर्ण साथियोंको तुमने सन्देहमे नियुक्त किया है, कहाहै कि-

न स्वल्पस्य कृते भूरि नाशयेन्मतिमान्नरः । एतदेवात्र पाण्डित्यं यत्स्वल्पाद्भूरिरक्षणम् ॥ १९ ॥”

बुद्धिमान् थोडेके निमित्त बहुतका नाश न करै, यह पडिताई है कि, थोडेहिसे बहुतकी रक्षा करै ॥ १९ ॥"

अथासौ तदवधार्य सञ्जीवकस्य रक्षापुरुषान निरूप्य अशेषसार्थं नीत्वा प्रस्थितः । अथ रक्षापुरुषा अपि बह्वपायं तद्वनं विदित्वा सञ्जीवकं परित्यज्य पृष्ठतो गत्वा अन्येद्युस्तं सार्थवाहं मिथ्याहुः-“स्वामिन् । मृतोऽसौ सञ्जीवकोऽस्माभिस्तु सार्थवाहस्याभीष्ट इति मत्वा वह्निना संस्कृतः” इति तच्छ्रुत्वा सार्थवाहः कृतज्ञतया स्नेहार्द्रहृदयस्तस्य और्ध्वदैहिकक्रियाः वृषोत्सर्गादिकाः सर्वाश्चकार । सञ्जीवकोऽप्यायुःशेषतया यमुनासलिलमिश्रैः शिशिरतरवातैः आप्यायितशरीरः कथञ्चिदप्युत्थाय यमुनातटमुपपेदे ॥ तत्र मरकतसदृशानि बालतृणाग्राणि भक्षयन् कतिपयैरहोभिर्हरवृषभ इव पीनः ककुद्मान् बलवांश्च संवृत्तः प्रत्यहं वल्मीकशिखराग्राणि शृङ्गाभ्यां विदारयन् गर्जमानः आस्ते । साधु चेदमुच्यते-

तब यह वैश्य इस बातको विचारकर, सञ्जीवकके निमित्त रक्षापुरुषोंको निरूपण कर और सब साथियोंको लेकर चला । तब रक्षक पुरुषभी अनेक कष्टयुक्त उस वनको देख सञ्जीवकको छोड उसके पीछे जाकर दूसरे दिन सार्थवाहसे मिथ्या कहने लगे-'हे स्वामिन् ! वह सञ्जीवक मरगया,हमने आप (सार्थवाह ) का प्यारा जानकर अग्निसे सस्कार किया" । यह सुनकर सार्थवाह कृतज्ञता और प्रेमसे आर्द्रहृदय होकर उसकी और्ध्वदैहिक क्रिया वृषोत्सर्गादि सब करता भया । ( इधर ) सञ्जीवकभी आयु शेष रहनेके कारण यमुनाजलसे मिली अत्यन्त शीतल वायुद्वारा तृप्तशरीरसे किसी प्रकार उठकर यमुनाके किनारे प्राप्त

( १२ ) पंचतन्त्रम् ।

हुआ, वहां मरकतमणीकी समान छोटे तृणके अग्रभाग भक्षण करता हुआ कुछ दिनोंमें शिवजीके वृषभके समान स्थूल ककुदवाला बलवान् हुआ प्रतिदिन वल्मीकके शिखरके अग्रभागोंको शृंगोंसे विदीर्ण करता गर्जता रहा । कहाभी सत्य है कि—

अरक्षितं तिष्ठति दैवरक्षितं सुरक्षितं दैवहतं विनश्यति । जीवत्यनाथोऽपि वने विसर्जितः कृतप्रयत्नोऽपि गृहे विन- श्यति ॥ २० ॥

अप्रतिपालित वस्तु दैवसे रक्षित हुई स्थित रहती है, भली प्रकार रक्षित हुई वस्तुभी दैवसे अरक्षितहो नष्ट होजातीहै, अनाथभी वनमे त्यागन किया जीताहै यत्न करनेपरभी घरमें नहीं जीताहै, वंशस्थ वृत्त ॥ २० ॥

अथ कदाचित् पिंगलको नाम सिंहः सर्वमृगपरिवृतःपिपा- साकुल उदकपानार्थं यमुनातटमवतीर्णः सञ्जीवकस्य गम्भीर- तरारावं दूरादेव अशृणोत् । तच्छ्रुत्वा अतीव व्याकुलहृदयः ससाध्वसमाकारं प्रच्छाद्य वटतले चतुर्मण्डलावस्थानेन अव- स्थितः । चतुर्मण्डलावस्थानं त्विदम्–सिंहः सिंहानुयायिनः काकरवाः किंवृत्ता इति। अथ तस्य करटकदमनकनामानौ द्वौ शृगालौ मन्त्रिपुत्रौ भ्रष्टाधिकारौ सदानुयायिनौ आस्ताम् । तौ च परस्परं मन्त्रयतः। तत्र दमनकोऽब्रवीत्–"भद्र करटक ! अयं तावदस्मत्स्वामी पिङ्गलक उदकग्रहणार्थं यमुनाकच्छ- मवतीर्य स्थितः स किं निमित्तं पिपासाकुलोऽपि निवृत्य व्यूहरचनां विधाय दौर्मनस्येनाभिभूतोऽत्र वटतले स्थितः"। करटक आह–"भद्र ! किमावयोरनेन व्यापारेण । उक्तञ्च यतः–

एक समय पिंगलक नाम सिंह सम्पूर्ण मृगोंसे युक्त प्याससे व्याकुल जल पीनेके निमित्त यमुनाके किनारे प्राप्त हुआ, संजीवकका अधिक गम्भीर शब्द दूरसे सुनता भया । वह सुन अत्यन्त व्याकुल हृदय होकर भयके आकारको छिपाकर वटवृक्षके नीचे चतुर्मण्डलावस्थान ( जिसके चारों ओर मृग बैठे हों ) से बैठा । चतुर्मण्डलावस्थान इसको कहतेहैं, कि सिंह, सिंहानुयायी, काकरव (काककेसे शब्द करनेवाले ), किंवृत्त ( क्या उपस्थित हुआ है, इस वृत्तान्तके जाननेवाले ) बैठे ।