भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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भाषाटीकासमेतम् । ( ६६ )

स्वागतेनाग्नयस्तृप्ता आसनेन शतक्रतुः । पादशौचेन पितर अर्घाच्छम्भुस्तथातिथिः ॥ १८३ ॥

आइये ऐसा कहनेसे अग्नि, आसनसे इन्द्र, चरणधोनेसे पितर और अतिथिके अर्घ देनेसे शिवजी प्रसन्न होजातेहैं ॥ १८३ ॥

कौलिकोऽपि तच्छ्रुत्वा भार्यामाह—"प्रिये ! गच्छ त्वमतिथिमादाय गृहं प्रति । पादशौचभोजनशयनादिभिः सत्कृत्य त्वं तत्रैव तिष्ठ । अहं तव कृते प्रभूतं मद्यमानेष्यामि" । एवमुक्त्वा प्रस्थितः। सापि भार्या पुंश्चली तमादाय प्रहसितवदना देवदत्तं मनसि ध्यायन्ती गृहं प्रति प्रतस्थे । अथवा साधु चेदमुच्यते—

कौलिकभी यह वचन सुन अपनी स्त्रीसे बोला—"हे प्रिये ! तू इस अतिथिको लेकर घर जा चरणधोना भोजन शयनादिसे सत्कार करके घरही रह, और मैं तेरे निमित्त बहुतसी मद्य लाताहूं" । यह कह चला । यह उसकी भार्या व्यभिचारिणी उसको ले हँसतीहुई देवदत्तका मनमे ध्यान करतीहुई घरको चली । अथवा सत्य कहाहै—

दुर्दिवसे घनतिमिरे दुःसञ्चरासु वनवीथिषु । पत्युर्विदेशगमने परमसुखं जघनचपलायाः ॥ १८४ ॥

मेघसे आच्छादित दिनमें, घन अन्धकारमे, जहा किसीका प्रवेश न हो ऐसी गलियोमे, पतिके विदेश जानेमें, चपलजंघा (रतिप्रिया) स्त्रियोंको परम सुख होताहै ॥ १८४ ॥

तथाच—
तैसेही—

पर्यङ्केष्वास्तरणं पतिमनुकूलं मनोहरं शयनम् । तृणमिव लघु मन्यन्ते कामिन्यश्चौर्यरतलुब्धाः ॥ १८५॥

पलंगपर सोना, पतिकी अनुकूलता, तथा मनोहर शयनको भी चौररातकी लालची स्त्रियें तृणकी समान लघु मानतीहैं ॥ १८५ ॥