भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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( ७ ) पञ्चतन्त्रम् ।

ज्ञात्वा च तं मन्मथपाशबद्धं
ग्रस्तामिषं मीनमिवोद्धरन्ति ॥ २०५ ॥

जबतक यह मनुष्यको प्रसक्त नहीं जानती तबतक प्रिय करतीहैं और पीछे उसे कामके वशीभूत जानकर मांस ग्रहण करनेवाली मछलीकी समान उठा-लेती हैं ॥ २०५ ॥

समुद्रवीचीव चलस्वभावाः
सन्ध्याभ्ररेखेव मुहूर्त्तंरागाः ।
स्त्रियः कृतार्थाः पुरुषं निरर्थं
निष्पीडितालक्तकवत्त्यजन्ति ॥ २०६ ॥

समुद्रकी तरंगोंकी समान चंचल स्वभाव संध्याकालके मेघरेखाकी समान मुहूर्त्तमात्रको रागवाली स्त्रिये सिद्धकाम होकर निर्धन पुरुषको निचोडे महावरकी समान त्याग देती हैं ॥ २०६ ॥

अनृतं साहसं माया मूर्खत्वमतिलोभता ।
अशौचं निर्दयत्वञ्च स्त्रीणां दोषाः स्वभावजाः ॥ २०७ ॥

झूंठ, साहस, माया, मूर्खत्व, अतिलोभ, अपवित्रता, निर्दयता यह स्त्रियोंके स्वाभाविक दोषहैं ॥ २०७ ॥

सम्मोहयन्ति मदयन्ति विडम्बयन्ति
निर्भर्त्सयन्ति रमयन्ति विषादयन्ति ।
एताः प्रविश्य सरलं हृदयं नराणां
किं वा न वामनयना न समाचरन्ति ॥ २०८ ॥

मोहित करती, मदकरती, प्रसन्न करती, वंचित करती, घुडकती, रमती और विषादित करती हैं, बहुत क्या यह कुटिल नेत्रवाली पुरुषोंके सरल हृदयोंमें प्रवेश करके क्या क्या नहीं करती हैं ॥ २०८ ॥

अन्तर्विषमया ह्येता बहिश्चैव मनोरमाः ।
गुञ्जाफलसमाकारा योषितः केन निर्मिताः ॥ २०९ ॥”

यह भीतरसे विषममय और बाहरसे मनोरम, चोंटलीके फलकी समान स्त्रियें किसने निर्मित की हैं ? ॥ २०९ ॥”

एवं चिन्तयतस्तस्य परिव्राजकस्य सा निशा महता कृच्छ्रेण अतिचक्राम। सा च दूतिका छिन्ननासिका स्वगृहं गत्वा