पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)
Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary
पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ७६ ) पञ्चतन्त्रम् ।
"भद्रे ! शीघ्र क्षुरभाण्ड (किस्वत) ला जिससे कि, क्षौरकर्म (हजामत) बनानेको जाऊं" । वहभी नाककटी अपने घरमेंसेही बहुत कार्य करनेकी व्याजतासे किसबतमेंसे एक उसतरा निकाल उसके निकट भेजती भई, इधर नापितनेभी उत्कंठासे एक क्षुरको देख क्रोधकर उसके सम्मुख उस क्षुरको फेंकदिया । इसी अवसरमें वह दुष्टा ऊपरको भुजा उठाकर स्वास लेती (हाय हाय) करती घरसे निकली, "अहो ! इस नाईने मुझ सदाचारमें रहनेवालीकी नाक काटदी, सो रक्षा करो रक्षा करो" । उसी अवसरमें राजपुरुष आकर उस नाईको डंडोंसे ताड़ितकर दृढ बंधनसे बांध उस छिन्ननासिकाके सहित धर्माधिकारीके स्थान (कचहरी) में लेजाकर वहांके सभ्योंसे बोले-"हे सभासदों ! सुनो । इस नाईने अपराधके विनाही इस स्त्रीरत्नका अंगभंग किया, सो जो कुछ इसका करना हो करो" । यह कहनेपर सभ्य बोले-"हे नाई ! क्यों तैने इस स्त्रीको व्यंगित किया ? क्या इसने परपुरुषकी अभिलाषा की । या प्राणद्रोह किया । या चोरी की । सो इसका अपराध कहो ?" । नाईभी प्रहारसे पीड़ित शरीर होनेके कारण कुछ न कहसका । उसको चुप देखकर सभ्य बोले-"अहो यह राजपुरुषोंका वचन सत्यहै । यह पापात्मा है इसने इस विचारी निर्दोषीको दूषित कियाहै । कहाहै-
भिन्नस्वरमुखवर्णः शङ्कितदृष्टिः समुत्पतिततेजाः । भवति हि पापं कृत्वा स्वकर्मसन्त्रासितः पुरुषः ॥ २१० ॥
और प्रकारका स्वर, मुखका अन्य वर्ण, संदिग्ध दृष्टि, उत्तपतित तेज (नष्टश्री) यह वस्तु पापकरके अपने कर्मसे सन्तापित पुरुषोंको होतीहैं ॥ २१० ॥
तथाच- और देखो-
आयाति स्खलितैः पादैर्मुखवैवर्ण्यसंयुतः । ललाटस्वेदभाक् भूरि गद्गदं भाषते वचः ॥ २११ ॥
स्खलित चरणोसे आताहै, मुखमें विवर्ण होताहै, माथेपर पसीना, और बोलनेमें गडबड़ ॥ २११ ॥
अधोदृष्टिर्भवेत्कृत्वा पापं प्राप्तः सभां नरः । तस्माद्यत्नात्परिज्ञेयश्चिह्नैरैतैर्विचक्षणैः ॥ २१२ ॥
पाप करके यदि मनुष्य सभामें आवे ता उसकी अधोदृष्टि होती है इसकारण इन चिन्होंसे मनुष्य यत्नसे इनको पहचाने ॥ २१२ ॥