पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation
महर्षि पराशर द्वारा
स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 100, कुल 170 में से
संदर्भ में पढ़ेंCC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri ८८ पराशरस्मृतिः [ अष्टमो- गोवधस्याऽनुरूपेण प्राजापत्यं विनिर्दिशेत् । प्राजापत्यं ततः कृच्छ्रं १विभजेत् तच्चतुर्विधम् ॥४४॥ गोवध के अनुरूप ही प्राजापत्य व्रत की व्यवस्था देनी चाहिए। इस प्रकार प्राजापत्य तथा कृच्छ्र का चार भाग करना चाहिए ॥४४॥ एकाहमेकभक्ताशी एकाहं नक्तभोजनः । अयाचितस्यैकमहरेकाहं मारुताशनः ॥४५॥ एक दिन एक समय केवल दिन में, दूसरे दिन केवल रात्रि में भोजन करे। तीसरे दिन अयाचित ( बिना मांगे हुए, जो स्वयं अपने पास आ जाये ) अन्न एक बार खाये, पुनः चौथे दिन केवल वायु पीकर रहे। यह प्राजापत्य कृच्छ्र का प्रथम पाद कहा जाता है ॥४५॥ दिनद्वयं चैकभक्तो द्विदिनं नक्तभोजनः । दिनद्वयमयाची स्याद् द्विदिनं मारुताशनः ॥४६॥ दो दिन तक केवल दिन में एक बार, फिर दो दिन तक केवल रात्रि में एक बार, फिर दो दिन तक अयाचित अर्थात् एक बार भोजन करे। तदनन्तर दो दिन तक केवल वायु के सहारे रहे। यह प्राजापत्य का दो पाद कहा जाता है ॥४६॥ त्रिदिनं चैकभक्ताशी त्रिदिनं नक्तभोजनः । दिनत्रयमयाची स्यात् त्रिदिनं मारुताशनः ॥४७॥ तीन दिन तक केवल दिन में एक बार, फिर तीन दिन तक केवल रात्रि में एक बार, फिर तीन दिन तक अयाचित अन्न केवल एक बार भोजन करे, फिर तीन दिन तक केवल वायु के सहारे रहे। यह प्राजा- पत्य कृच्छ्र का तीन पाद कहा जाता है ॥४७॥ चतुरहं त्वेकभक्ताशी चतुरहं नक्तभोजनः । चतुर्दिनमयाची स्याच्चतुरहं मारुताशनः ॥४८॥ १. 'विभजेत चतुर्विधम्' इति । Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal