भारतकोश
पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation

महर्षि पराशर द्वारा

स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished170 पृष्ठ

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ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता ८७ गौशाला में शयन करे, फिर दिन में गौओं के पीछे-पीछे चले ॥३९॥ उष्णे वर्षति शीते वा मारुते वाति वा भृशम् । न कुर्वीताऽऽत्मनस्त्राणं गोरकृत्वा तु शक्तितः ॥४०॥ गरमी, वर्षा, शीत अथवा वेग से वायु के बहने पर भी शक्ति के अनुसार जब तक गौओं की रक्षा का प्रबन्ध न कर ले तब तक स्वयं भी अपनी रक्षा के लिए कोई उपाय न करे ॥४०॥ आत्मनो यदि वाऽन्येषाम् गृहे क्षेत्रे खलेऽथवा । भक्षयन्तीं न कथयेत् पिबन्तं चैव वत्सकम् ॥४१॥ गौ यदि अपने घर, खेत अथवा खलिहान में अन्नादि खा रही हो अथवा किसी दूसरे के घर, खेत-खलिहान में खा रही हो। या अपने बछड़े को दूध पिलाती हो, फिर भी किसी से न कहे ॥४१॥ पिबन्तीषु पिबेत्तोयं संविशन्तीषु संविशेत् । पतितां पङ्कमग्नां वा सर्वप्राणैः समुद्धरेत् ॥४२॥ जब गाय जल पीये तो स्वयं भी जल पीये। गाय यदि सोवे तो स्वयं भी सोवे या बैठे। यदि गाय कहीं गिर पड़ी हो अथवा कीचड़ में फँस गयी हो, तो प्राणों की बाजी लगाकर उसका उद्धार करे ॥४२॥ ब्राह्मणार्थे गवार्थे वा यस्तु प्राणान् परित्यजेत् । मुच्यते ब्रह्महत्याया गोप्ता ²गोब्राह्मणस्य च । ४३॥ ब्राह्मण अथवा गौ की रक्षा के लिए जो अपने प्राणों का त्याग करता है वह ब्रह्महत्या के भी पाप से छूट जाता है तथा गौ और ब्राह्मण की रक्षा कर जो जीवित भी रहता है वह भी ब्रह्महत्या के पाप से मुक्त हो जाता है ॥४३॥ १ 'पङ्कलग्ना' इति पा० । २. 'गोब्राह्मणस्य' इत्यपि पाठः ।