पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation
महर्षि पराशर द्वारा
स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 98, कुल 170 में से
संदर्भ में पढ़ेंचारों वेदों को जाननेवाले अविकल्पी अर्थात् शास्त्र में सन्देह न करनेवाले, वेदांग एवं धर्मशास्त्र के पढ़ने-पढ़ानेवाले, इनके एक की भी परिषद् कही जाती है। मुख्य रूप से क्रमशः तीनों आश्रमों में निवास करनेवाले दश अथवा उससे अधिक संख्या की भी परिषद् हो सकती है ॥३५॥ राज्ञश्चाऽनुमते स्थित्वा प्रायश्चित्तं विनिर्दिशेत् । स्वयमेव न कर्तव्यं कर्तव्या स्वल्पनिष्कृतिः ॥३६॥ ब्राह्मण राजा के आज्ञानुसार ही प्रायश्चित्त की व्यवस्था दे। स्वयं इच्छानुसार कुछ भी न बतलावे। यदि छोटा प्रायश्चित्त हो तो उसे स्वयं इच्छानुसार भी बता सकता है ॥३६॥ ब्राह्मणांस्तानतिक्रम्य राजा कर्तुं १यदिच्छति । तत्पापं शतधा भूत्वा राजानमनुगच्छति ॥३७॥ यदि राजा धर्मशास्त्रज्ञ ब्राह्मणों का अपमान कर स्वयं प्रायश्चित्त कराना चाहता है, तो पापी पुरुष का पाप सौगुना होकर स्वयं राजा को लगता है। ३७॥ प्रायश्चित्तं सदा दद्याद् देवतायतनाग्रतः । आत्मकृच्छ्रं ततः कृत्वा जपेद् वै वेदमातरम् ॥३८॥ ब्राह्मण किसी वेद-मन्दिर के सामने प्रायश्चित्त की व्यवस्था दे। तदनन्तर प्रायश्चित्त देने के कारण आत्मकृच्छ्र कर वेदमाता गायत्री का यथाशक्ति जप करे ॥३८॥ स-शिखं वपनं कृत्वा त्रिसन्ध्यमवगाहनम् । गवां मध्ये वसेद् रात्रौ दिवा गाश्चाऽप्यनुव्रजेत् ॥३९॥ गोहत्यारों को क्या करना चाहिए ? इसको कहते हैं—हत्यारा शिखा सहित शिर को मुण्डन करावे, तीनों काल स्नान करे। रात्रि में
१. 'यदीच्छति' इति पा० ।